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आंदोलन के नाम पर अराजकता लोकतंत्र नहीं, जनहित के लिए संवाद जरूरी: तरुण मिश्र

ICN24 Newsroom 23 जुल॰ 2026, 04:35 am
आंदोलन के नाम पर अराजकता लोकतंत्र नहीं, जनहित के लिए संवाद जरूरी: तरुण मिश्र

तरुण मिश्र ने हालिया छात्र प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों का समाधान सड़कों पर टकराव के बजाय सार्थक संवाद से निकलना चाहिए।

नई दिल्ली। देश की शिक्षा व्यवस्था और हाल के दिनों में सामने आए पेपर लीक जैसे गंभीर मामलों को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच, लेखक और विचारक तरुण मिश्र ने एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। मिश्र ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आंदोलन के नाम पर फैलाई जा रही अराजकता को किसी भी स्थिति में लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी राजनीति जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनहित को नुकसान पहुंचाती है, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। उदय भूमि से बातचीत के दौरान तरुण मिश्र ने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में हर नागरिक और समूह को विरोध करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार की सीमा वहां समाप्त हो जाती है जहां से आम जनता की परेशानी शुरू होती है। उन्होंने हालिया प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि सड़कों पर टकराव और सुरक्षा व्यवस्था को बाधित करना समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं है। उनके अनुसार, छात्रों के भविष्य से जुड़े संवेदनशील मुद्दों का हल केवल मेज पर बैठकर किए गए संवाद से ही संभव है। मिश्र ने पेपर लीक की घटनाओं को बेहद गंभीर बताया, लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि इन मुद्दों का राजनीतिकरण करने वाली ताकतें समाधान के बजाय अराजकता को बढ़ावा दे रही हैं। उन्होंने कहा, "जब आंदोलन का उद्देश्य सुधार के बजाय केवल व्यवधान पैदा करना हो जाता है, तो वह अपनी नैतिकता खो देता है।" उन्होंने प्रशासन और प्रदर्शनकारियों, दोनों से अपील की कि वे संयम बरतें और ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करें जिससे भविष्य में परीक्षाओं की शुचिता बनी रहे और आम नागरिकों को आवाजाही में कोई समस्या न हो। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह विषय प्रासंगिक है। प्रवासी भारतीय अक्सर भारत की शिक्षा व्यवस्था की साख और वहां हो रहे प्रशासनिक सुधारों पर नजर रखते हैं। तरुण मिश्र का यह बयान उस समय आया है जब वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्थानों की विश्वसनीयता को लेकर चर्चा हो रही है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे कई अभिभावक, जिनके बच्चे भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, इस अस्थिरता को लेकर चिंतित हैं। मिश्र के अनुसार, व्यवस्था में सुधार के लिए दबाव बनाना जरूरी है, लेकिन वह दबाव रचनात्मक होना चाहिए न कि विनाशकारी। अंत में, उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को छात्रों की शिकायतों को सुनने के लिए एक अधिक पारदर्शी और त्वरित तंत्र विकसित करना चाहिए। साथ ही, उन्होंने राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि वे छात्रों के आक्रोश को अपनी राजनीति चमकाने का साधन न बनाएं। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नीतिगत विरोध और जनहित के बीच एक संतुलन बना रहे।
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