शिक्षा
NCERT की किताबों में कार्टूनों का विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में बनाई समीक्षा कमेटी
ICN24 Newsroom 16 जून 2026, 10:45 pm

सुप्रीम कोर्ट ने NCERT की पाठ्यपुस्तकों में राजनीतिक कार्टूनों के उपयोग की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित की है। सॉलिसिटर जनरल ने इन कार्टूनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए थे।
भारत के उच्चतम न्यायालय ने स्कूली शिक्षा की सामग्री को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) की पाठ्यपुस्तकों में शामिल कार्टूनों की समीक्षा करने का आदेश दिया है। अदालत ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे। यह पैनल इस बात का आकलन करेगा कि क्या शैक्षणिक पुस्तकों में राजनीतिक और व्यंग्यात्मक कार्टूनों का उपयोग छात्रों के लिए उपयुक्त और मर्यादित है।
यह मामला तब चर्चा में आया जब केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई। मेहता ने तर्क दिया कि स्कूल की पाठ्यपुस्तकें ऐसी जगह नहीं हैं जहां कार्टूनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि इस तरह के चित्रण से किशोर अवस्था के छात्रों के मन में संवैधानिक संस्थाओं और राजनीतिक प्रक्रियाओं के प्रति गलत धारणा बन सकती है। सरकार का तर्क है कि शिक्षा का माध्यम गंभीर और तथ्यात्मक होना चाहिए, न कि व्यंग्यात्मक।
न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस संवदेनशील मुद्दे पर विचार करते हुए कहा कि शिक्षा का स्तर और उसकी सामग्री बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समीक्षा समिति में शिक्षाविदों और विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि वे संतुलित दृष्टिकोण पेश कर सकें। यह समिति न केवल कार्टूनों के कंटेंट को देखेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि भविष्य में किस तरह के दृश्यों का उपयोग किताबों में किया जा सकता है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय रहते हैं जो अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति और इतिहास से जोड़ने के लिए NCERT की किताबों का सहारा लेते हैं। विदेशी धरती पर पढ़ रहे भारतीय मूल के बच्चों के लिए ये किताबें भारत की छवि और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने का प्राथमिक स्रोत होती हैं। ऐसे में किताबों की सामग्री में किसी भी प्रकार का बदलाव सीधे तौर पर प्रवासी परिवारों के शैक्षणिक संसाधनों को प्रभावित करता है।
विपक्ष और कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि कार्टून छात्रों में आलोचनात्मक सोच (critical thinking) विकसित करने में मदद करते हैं। हालांकि, कानूनी बहस अब इस बात पर केंद्रित है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शैक्षणिक मर्यादा के बीच एक महीन रेखा कहां खींची जानी चाहिए। समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि भारत के स्कूली पाठ्यक्रम में अब भविष्य में कार्टूनों की जगह बचेगी या नहीं।
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