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आयुर्वेदिक इंटरमिटेंट फास्टिंग: अपनी 'प्रकृति' के अनुसार पाचन और स्वास्थ्य सुधारने का नया तरीका
ICN24 Newsroom 8 जुल॰ 2026, 02:31 am

आयुर्वेद और आधुनिक इंटरमिटेंट फास्टिंग का संगम स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के लिए एक प्रभावी मार्ग बन रहा है। जानें कैसे अपनी 'दोष' प्रकृति के अनुसार उपवास करना आपके पाचन तंत्र को बदल सकता है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के बीच स्वास्थ्य और कल्याण (wellness) को लेकर एक नई जागरूकता देखी जा रही है। जहां आधुनिक इंटरमिटेंट फास्टिंग (Intermittent Fasting) दुनिया भर में लोकप्रियता हासिल कर रही है, वहीं भारतीय पारंपरिक विज्ञान 'आयुर्वेद' इसमें एक महत्वपूर्ण और व्यक्तिगत आयाम जोड़ रहा है। आयुर्वेद के अनुसार, उपवास केवल वजन घटाने का साधन नहीं है, बल्कि यह शरीर की 'अग्नि' (पाचन अग्नि) को प्रज्वलित करने और संचित विषाक्त पदार्थों या 'आम' को बाहर निकालने की एक प्रक्रिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग का एक ही तरीका हर किसी के लिए प्रभावी नहीं हो सकता। आयुर्वेद के अनुसार, व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति—वात, पित्त और कफ—यह निर्धारित करती है कि उसे कितनी देर तक और किस तरह से उपवास करना चाहिए। उदाहरण के लिए, 'वात' प्रकृति वाले लोगों को, जिनका पाचन तंत्र अक्सर संवेदनशील और अस्थिर होता है, बहुत लंबे समय तक उपवास करने से बचना चाहिए। उनके लिए 12 घंटे का उपवास और नियमित अंतराल पर पौष्टिक भोजन अधिक लाभकारी होता है। इसके विपरीत, 'कफ' प्रकृति के लोग स्वाभाविक रूप से धीमी पाचन शक्ति वाले होते हैं, और वे 16 घंटे या उससे अधिक के उपवास को आसानी से सहन कर सकते हैं।
'पित्त' प्रकृति वाले व्यक्तियों के लिए, जिनकी जठराग्नि पहले से ही तेज होती है, अत्यधिक उपवास से चिड़चिड़ापन या एसिडिटी की समस्या हो सकती है। उन्हें उपवास के दौरान नारियल पानी या एलोवेरा जैसे शीतलता प्रदान करने वाले तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया के व्यस्त जीवनशैली में, जहां भोजन का समय अक्सर अनिश्चित होता है, आयुर्वेद का यह सिद्धांत भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए आधुनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है।
आयुर्वेदिक उपवास का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू 'दिनचर्या' है। केवल खाने के समय को सीमित करना ही काफी नहीं है; यह भी आवश्यक है कि आप क्या और कब खा रहे हैं। आयुर्वेद सुझाव देता है कि सबसे भारी भोजन दोपहर में करना चाहिए जब सूर्य अपने चरम पर होता है, क्योंकि उस समय हमारी पाचन शक्ति सबसे अधिक होती है। रात का भोजन हल्का और सोने से कम से कम तीन घंटे पहले होना चाहिए।
पाचन स्वास्थ्य को और बेहतर बनाने के लिए, उपवास तोड़ने के समय सूप, खिचड़ी या पकी हुई सब्जियों जैसे सुपाच्य भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए। ठंडे या कच्चे भोजन के बजाय गर्म और ताजा भोजन शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने में मदद करता है। इस प्रकार, आयुर्वेद और इंटरमिटेंट फास्टिंग का यह मेल न केवल शारीरिक वजन को संतुलित करता है, बल्कि मानसिक स्पष्टता और दीर्घकालिक स्वास्थ्य को भी बढ़ावा देता है।
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