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क्या आप बच्चों का खर्च उठा सकते हैं? वित्तीय बोझ के साथ-साथ जीवनशैली में बदलाव भी है बड़ी चुनौती
ICN24 Newsroom 12 जुल॰ 2026, 01:31 am

ऑस्ट्रेलिया में बढ़ती महंगाई के बीच, क्या भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई परिवार बच्चों की परवरिश के लिए तैयार हैं? विशेषज्ञ बताते हैं कि यह केवल पैसों का नहीं, बल्कि जीवनशैली के समझौतों का मामला है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए परिवार शुरू करना हमेशा से एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मील का पत्थर रहा है। हालांकि, मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में, यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या युवा दंपत्ति बच्चों का खर्च उठा सकते हैं? हालिया चर्चाओं और वित्त विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के पालन-पोषण की वास्तविक लागत केवल स्कूल की फीस या कपड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वह सब कुछ शामिल है जिसे माता-पिता को छोड़ना पड़ता है।
प्रसिद्ध वित्त ब्लॉगर डॉन चेर के अनुसार, कई जोड़ों के लिए परिवार शुरू करना आर्थिक रूप से इसलिए असंभव लगता है क्योंकि वे अपनी वर्तमान जीवनशैली से समझौता करने के लिए तैयार नहीं होते। ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख शहरों जैसे सिडनी और मेलबर्न में रहने वाले प्रवासियों के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है। यहाँ न केवल रहने की लागत अधिक है, बल्कि भारत की तुलना में यहाँ दादा-दादी या अन्य रिश्तेदारों का तत्काल सहयोग भी उपलब्ध नहीं होता, जिससे 'चाइल्डकेयर' (Childcare) का खर्च काफी बढ़ जाता है।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई संदर्भ में, कई परिवार अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा 'मॉर्टगेज' या घर की किश्तों में निवेश करते हैं। इसके साथ ही, भारत में रह रहे माता-पिता की सहायता करना और सामाजिक समारोहों में सक्रिय रहना भी जीवनशैली का हिस्सा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई जोड़ा बच्चा पैदा करने का निर्णय लेता है, तो उन्हें अपनी विदेश यात्राओं, बाहर खाना खाने और लग्जरी खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। यही वह 'अवसर लागत' (Opportunity Cost) है, जिसे अक्सर वित्तीय गणनाओं में अनदेखा कर दिया जाता है।
डॉन चेर का तर्क है कि यदि आप हर सप्ताहांत बाहर जाना चाहते हैं या हर साल महंगी छुट्टियों पर जाना चाहते हैं, तो बच्चा पैदा करने के बाद आपकी वित्तीय स्थिति डगमगा सकती है। बच्चों की परवरिश के लिए न केवल बचत की आवश्यकता होती है, बल्कि प्राथमिकताओं के पूर्ण पुनर्गठन की भी आवश्यकता होती है। ऑस्ट्रेलिया में डे-केयर की उच्च दरों को देखते हुए, कई बार परिवार के एक सदस्य को काम छोड़ना पड़ता है या काम के घंटे कम करने पड़ते हैं, जिससे घरेलू आय पर सीधा असर पड़ता है।
भारतीय समुदाय में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। यहाँ के माता-पिता अक्सर अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने का सपना देखते हैं, जिसकी लागत हजारों डॉलर में हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि परिवार शुरू करने से पहले जोड़ों को एक 'लाइफस्टाइल ऑडिट' करना चाहिए। इसमें यह देखना चाहिए कि क्या वे अपने वर्तमान सुख-सुविधाओं को कम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं। अंततः, बच्चों का खर्च उठाना केवल गणितीय गणना नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली के चुनाव और प्राथमिकताओं के बदलाव की कहानी है।
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