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“गंगा पर चिकन खाना अपराध नहीं, कोई कानून इसे नहीं रोकता”: न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर दिया बड़ा बयान
ICN24 Newsroom 27 जुल॰ 2026, 04:36 pm

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने वाराणसी में 14 युवकों की गिरफ्तारी की आलोचना करते हुए कहा कि गंगा किनारे मांसाहार पर कोई कानूनी पाबंदी नहीं है।
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून के शासन को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शनिवार को भोपाल में राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय (NLIU) में चौथे न्यायमूर्ति जीपी सिंह स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि गंगा नदी पर चिकन खाना कोई अपराध नहीं है, क्योंकि देश का कोई भी कानून ऐसा करने से नहीं रोकता है। न्यायमूर्ति भुइयां ने इस साल मार्च में वाराणसी में 14 मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी पर कड़ी आपत्ति जताई, जिन्हें नाव पर चिकन खाने के आरोप में हिरासत में लिया गया था।
न्यायमूर्ति भुइयां ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि कानून की प्रवर्तन एजेंसियों को केवल उन्हीं कार्यों के लिए दंडित करना चाहिए जो स्पष्ट रूप से अवैध हों। उन्होंने कहा, "इस साल मार्च में वाराणसी में 14 युवाओं को गंगा नदी पर एक नाव में चिकन खाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। लेकिन मेरा प्रश्न यह है कि क्या गंगा पर चिकन खाना कोई अपराध है? क्या कोई कानून इसे प्रतिबंधित करता है? उत्तर है—नहीं। जब तक कोई कानून किसी कृत्य को अपराध घोषित नहीं करता, तब तक पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती।"
वाराणसी की घटना का संदर्भ देते हुए न्यायमूर्ति ने कहा कि सांस्कृतिक संवेदनाएं और धार्मिक भावनाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन वे कानून का विकल्प नहीं बन सकतीं। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि कैसे कभी-कभी व्यक्तिगत पसंद और खान-पान की आदतों को आपराधिक रंग दे दिया जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उपयोग लोगों को परेशान करने या उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, विशेषकर तब जब कोई संवैधानिक या वैधानिक उल्लंघन न हुआ हो।
यह मामला तब चर्चा में आया था जब वाराणसी पुलिस ने 'धार्मिक भावनाओं को आहत करने' और अन्य धाराओं के तहत इन युवाओं के खिलाफ कार्रवाई की थी। न्यायमूर्ति भुइयां ने तर्क दिया कि कानून की व्याख्या संकीर्ण और मनमानी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी नागरिक को बिना किसी ठोस कानूनी आधार के उसकी स्वतंत्रता से वंचित न किया जाए।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर प्रासंगिक है, क्योंकि यह भारत में कानून के शासन और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति न्यायपालिका की सजगता को दर्शाती है। आधुनिक लोकतंत्र में, जहां खान-पान और जीवनशैली के चुनाव व्यक्तिगत अधिकार माने जाते हैं, वहां देश की सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश का यह रुख स्पष्ट करता है कि भारत का संविधान कानून से ऊपर किसी भी धारणा को स्वीकार नहीं करता है। न्यायमूर्ति भुइयां का यह व्याख्यान न्यायपालिका की उस भूमिका की याद दिलाता है जो नागरिकों के अधिकारों की ढाल के रूप में कार्य करती है।
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