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वैश्विक भू-राजनीति की मार: खाद की किल्लत और प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार सौदे से किसान चिंतित

ICN24 Newsroom 13 जून 2026, 02:31 pm
वैश्विक भू-राजनीति की मार: खाद की किल्लत और प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार सौदे से किसान चिंतित

दुनिया भर में जारी युद्ध और कूटनीतिक तनाव के बीच भारतीय किसान खाद की कमी और डीजल की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं, जबकि नए व्यापार सौदे नई चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं।

दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली भू-राजनीतिक हलचल का सीधा असर भारत के गांवों और खेतों तक पहुंचता है। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे संघर्षों और कूटनीतिक बदलावों ने भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ जहां रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के तनाव ने खाद और ईंधन की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ होने वाले संभावित व्यापार सौदे भारतीय किसानों की चिंताएं बढ़ा रहे हैं। भारत अपनी उर्वरक जरूरतों, विशेष रूप से पोटाश और फॉस्फेटिक खाद के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। काला सागर क्षेत्र में जारी तनाव के कारण उर्वरकों के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़े हैं, जिसका सीधा बोझ भारत सरकार के सब्सिडी बिल और किसानों की जेब पर पड़ रहा है। डीजल की कीमतों में अस्थिरता ने खेती की लागत को और बढ़ा दिया है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों के लिए लाभ का मार्जिन कम होता जा रहा है। इन घरेलू चुनौतियों के बीच, भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक व्यापार समझौते की सुगबुगाहट तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समझौते के तहत अमेरिकी डेयरी उत्पादों और रियायती दरों वाले अनाज के लिए भारतीय बाजार खोले जाते हैं, तो स्थानीय किसानों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका लंबे समय से भारत के कृषि टैरिफ को कम करने का दबाव बना रहा है। यदि ऐसा होता है, तो भारत के दुग्ध उत्पादक और अनाज किसान भारी संकट में पड़ सकते हैं, क्योंकि वे अमेरिकी कॉर्पोरेट कृषि क्षेत्र की तुलना में सरकारी सब्सिडी और संसाधनों के मामले में पीछे हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है। प्रवासी भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों से आता है, जिनके परिवार सीधे तौर पर इन बदलावों से प्रभावित होते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के दौर में भारत को अपनी कृषि नीतियों और व्यापार समझौतों में संतुलन बनाना होगा। अंततः, भारतीय किसान केवल मौसम की अनिश्चितता से ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के उतार-चढ़ाव से भी लड़ रहा है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के साथ-साथ देश के अन्नदाताओं के हितों की रक्षा कैसे सुनिश्चित करती है। आने वाले महीनों में होने वाली व्यापारिक वार्ताएं यह तय करेंगी कि भारतीय कृषि क्षेत्र आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा या वैश्विक बाजार के दबाव में झुकेगा।
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