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NCERT की नई पहचान और पाठ्यक्रम में बदलाव: भारतीय शिक्षा प्रणाली के भविष्य पर उठते सवाल

ICN24 Newsroom 16 जून 2026, 11:00 pm
NCERT की नई पहचान और पाठ्यक्रम में बदलाव: भारतीय शिक्षा प्रणाली के भविष्य पर उठते सवाल

एनसीईआरटी द्वारा स्कूली पाठ्यपुस्तकों में किए गए हालिया बदलावों ने शिक्षाविदों और भारतीय प्रवासियों के बीच बहस छेड़ दी है। क्या ये बदलाव आधुनिक भारत की सही तस्वीर पेश करते हैं?

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने हाल के वर्षों में भारत की स्कूली पाठ्यपुस्तकों में व्यापक बदलाव किए हैं, जिसे परिषद ने 'पाठ्यक्रम युक्तिकरण' (Curriculum Rationalisation) का नाम दिया है। हालांकि, इन बदलावों ने न केवल भारत में बल्कि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय के बीच भी एक गंभीर चर्चा को जन्म दिया है। आलोचकों और शिक्षाविदों का कहना है कि ये संशोधन भारत की साझा विरासत और जटिल इतिहास को सरल बनाने या उसे सीमित करने का प्रयास कर सकते हैं। प्रमुख बदलावों में मुग़ल काल के अध्यायों को कम करना, 2002 के गुजरात दंगों के संदर्भों को हटाना और हाल ही में 'इंडिया' शब्द के स्थान पर 'भारत' के उपयोग पर ज़ोर देना शामिल है। एनसीईआरटी के अधिकारियों का तर्क है कि ये बदलाव छात्रों पर पढ़ाई का बोझ कम करने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप भारतीय गौरव को पुनर्जीवित करने के लिए किए गए हैं। संस्थान का कहना है कि शिक्षा को समकालीन और प्रासंगिक बनाना उनकी प्राथमिकता है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय माता-पिता और छात्रों के लिए यह मुद्दा विशेष महत्व रखता है। यहाँ का भारतीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है और वे चाहते हैं कि उनके बच्चे भारत के उस इतिहास को जानें जो संतुलित और तथ्यपरक हो। कई प्रवासी अभिभावकों का मानना है कि यदि भारत में शिक्षा का स्वरूप बदलता है, तो विदेशों में भारतीय इतिहास के प्रति दृष्टिकोण भी प्रभावित हो सकता है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में स्थित भारतीय पूरक विद्यालयों (Heritage Schools) में भी इन बदलावों के प्रभाव को लेकर चर्चाएँ तेज़ हो गई हैं। शिक्षाविदों का एक वर्ग इस बात से चिंतित है कि महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को हटाने से छात्रों की आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) विकसित करने की क्षमता प्रभावित होगी। उनका तर्क है कि इतिहास केवल गौरवगाथा नहीं है, बल्कि यह पिछली गलतियों से सीखने का एक माध्यम भी है। वहीं, समर्थकों का कहना है कि औपनिवेशिक मानसिकता को त्यागने के लिए पाठ्यक्रम में स्वदेशी दृष्टिकोण को शामिल करना अनिवार्य है। जैसे-जैसे एनसीईआरटी अपनी नई पहचान गढ़ने की ओर बढ़ रहा है, सवाल अभी भी बना हुआ है: क्या ये बदलाव वास्तव में छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर रहे हैं, या यह केवल एक वैचारिक बदलाव है? भारतीय प्रवासियों के लिए, जो अक्सर पश्चिमी और भारतीय शिक्षा प्रणालियों के बीच सेतु का कार्य करते हैं, यह बहस केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी पहचान और आने वाली पीढ़ी को विरासत में दी जाने वाली समझ से जुड़ी है।
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