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सीलिएक रोग पर नया शोध: वैज्ञानिकों ने प्रतिरक्षा कोशिकाओं में पाया बड़ा दोष, पारंपरिक धारणाओं को चुनौती

ICN24 Newsroom 12 जून 2026, 06:01 pm
सीलिएक रोग पर नया शोध: वैज्ञानिकों ने प्रतिरक्षा कोशिकाओं में पाया बड़ा दोष, पारंपरिक धारणाओं को चुनौती

वैज्ञानिकों ने सीलिएक रोग के कारणों में एक नई खोज की है, जिसमें अत्यधिक सक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली के बजाय कमजोरी को बीमारी की मुख्य जड़ माना गया है।

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति करते हुए शोधकर्ताओं ने सीलिएक रोग (Celiac disease) की उत्पत्ति को लेकर एक नई और चौंकाने वाली खोज की है। अब तक यह माना जाता था कि सीलिएक रोग एक अत्यधिक सक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) का परिणाम है, जो ग्लूटेन मिलने पर शरीर पर हमला कर देती है। हालांकि, हालिया शोध से संकेत मिलता है कि इस बीमारी की शुरुआत वास्तव में एक कमजोर और दोषपूर्ण प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के कारण हो सकती है। सीलिएक रोग एक ऑटोइम्यून स्थिति है जहां गेहूं, जौ और राई में पाए जाने वाले प्रोटीन 'ग्लूटेन' के सेवन से छोटी आंत में सूजन और क्षति होती है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह शोध विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई आबादी में आहार संबंधी संवेदनशीलता और सीलिएक के मामलों में वृद्धि देखी गई है। पारंपरिक भारतीय आहार, जिसमें गेहूं से बनी रोटियां और पराठे मुख्य हिस्सा होते हैं, इस बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करते हैं। प्रमुख शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने विशिष्ट प्रतिरक्षा कोशिकाओं में 'खामियों' की पहचान की है जो शरीर को ग्लूटेन के प्रति सही तरीके से प्रतिक्रिया करने से रोकती हैं। यह खोज इस स्थापित धारणा को चुनौती देती है कि ऑटोइम्यून बीमारियां केवल शरीर की सुरक्षा प्रणाली के 'हाइपर-एक्टिव' होने के कारण होती हैं। इसके बजाय, यह पाया गया कि कुछ कोशिकाओं की विफलता के कारण शरीर ग्लूटेन को एक खतरे के रूप में गलत पहचानता है और फिर सुरक्षा की प्रक्रिया में खुद को नुकसान पहुंचाने लगता है। सिडनी और मेलबर्न जैसे प्रमुख ऑस्ट्रेलियाई शहरों में स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस नई जानकारी से सीलिएक के निदान और उपचार में बदलाव आ सकता है। वर्तमान में, सीलिएक का एकमात्र प्रभावी उपचार ग्लूटेन-मुक्त आहार का सख्ती से पालन करना है। यदि शोधकर्ता इन दोषपूर्ण कोशिकाओं को ठीक करने या उनकी कार्यप्रणाली को पुनर्स्थापित करने का तरीका ढूंढ लेते हैं, तो भविष्य में रोगियों को सख्त परहेज से मुक्ति मिल सकती है। भारतीय प्रवासियों के संदर्भ में, जो अक्सर ऑस्ट्रेलिया आने के बाद अपने खान-पान की आदतों और पर्यावरण में बदलाव का अनुभव करते हैं, आंतों के स्वास्थ्य को समझना अनिवार्य हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जेनेटिक्स और पर्यावरणीय कारकों का मिश्रण भारतीय मूल के लोगों में इस बीमारी के प्रसार को प्रभावित कर सकता है। यह नया शोध न केवल वैज्ञानिक समझ को बढ़ाता है बल्कि उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण भी है जो अपनी पसंदीदा रोटियों और पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेने से कतराते हैं।
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