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सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक विधान परिषद के उपाध्यक्ष की याचिका खारिज की; वोटों की दोबारा गिनती का रास्ता साफ
ICN24 Newsroom 17 जुल॰ 2026, 10:32 am

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक विधान परिषद के उपाध्यक्ष एम.के. प्राणेश की याचिका खारिज करते हुए 2021 के चिकमगलूर चुनाव में वोटों की दोबारा गिनती के हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक विधान परिषद के उपाध्यक्ष एम.के. प्राणेश द्वारा दायर उस विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने वोटों की दोबारा गिनती के कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती दी थी। यह मामला 2021 में चिकमगलूर स्थानीय अधिकारी निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधान परिषद के लिए हुए चुनाव से संबंधित है। शीर्ष अदालत का यह निर्णय चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने स्पष्ट किया कि उन्हें उच्च न्यायालय के पिछले आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नजर नहीं आता। ज्ञात हो कि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कांग्रेस की पराजित उम्मीदवार गायत्री शांते गौड़ा की याचिका पर सुनवाई करते हुए पुनर्मतगणना का आदेश दिया था। गौड़ा ने चुनाव प्रक्रिया में धांधली और गिनती के दौरान विसंगतियों का आरोप लगाया था, जिसके आधार पर कोर्ट ने यह सख्त रुख अपनाया था।
यह कानूनी लड़ाई कर्नाटक की स्थानीय राजनीति में गहरे प्रभाव डालती है। 2021 के चुनाव में एम.के. प्राणेश, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार थे, उन्हें बहुत ही कम मतों के अंतर से विजयी घोषित किया गया था। कांग्रेस उम्मीदवार गायत्री शांते गौड़ा ने इस परिणाम को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि गिनती के समय उनके पक्ष में आए वैध मतों को जानबूझकर खारिज किया गया और कुछ अमान्य मतों को प्रतिद्वंद्वी के खाते में जोड़ दिया गया। उच्च न्यायालय ने इन दलीलों में प्रथम दृष्टया दम पाया और दोबारा गिनती का आदेश दिया।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए, जो भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी शुचिता में गहरी रुचि रखते हैं, यह खबर न्यायपालिका की स्वतंत्रता का प्रतीक है। प्रवासी भारतीय अक्सर भारत में होने वाले चुनावों और वहां की कानूनी व्यवस्था पर चर्चा करते हैं। यह फैसला दर्शाता है कि भारतीय न्याय प्रणाली छोटे से छोटे स्तर के चुनावों में भी जवाबदेही तय करने के लिए प्रतिबद्ध है। विशेष रूप से कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले प्रवासी इस राजनीतिक घटनाक्रम को राज्य की भविष्य की राजनीति के संकेत के रूप में देख रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है। आयोग को अब उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार वोटों की दोबारा गिनती की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। यदि पुनर्मतगणना में परिणाम बदलते हैं, तो यह कर्नाटक विधान परिषद के गणित को प्रभावित कर सकता है। प्राणेश के लिए यह एक बड़ा झटका है क्योंकि वह वर्तमान में परिषद के उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर आसीन हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आदेश चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को भविष्य में अधिक सतर्क रहने और चुनावी अधिकारियों को अपनी ड्यूटी पूरी निष्पक्षता से निभाने का संदेश देते हैं। लोकतांत्रिक ढांचे में एक-एक वोट की कीमत होती है और जब जीत का अंतर बेहद कम हो, तो न्यायिक हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करता है कि जनमत का सही प्रतिबिंब सामने आए। अब सबकी नजरें दोबारा होने वाली मतगणना की तारीख और उसके संभावित परिणामों पर टिकी हैं।
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