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अमेरिका में H-1B वीजा धारकों के लिए मुश्किल हो सकता है ग्रीन कार्ड, भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स पर मंडराया संकट
ICN24 Newsroom 7 जून 2026, 11:00 am

अमेरिका में एच-1बी वीजा नियमों में प्रस्तावित बदलावों से भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए ग्रीन कार्ड की राह कठिन हो सकती है, जिससे हजारों परिवारों का भविष्य अधर में लटक गया है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में आव्रजन नीतियों में संभावित कड़े बदलावों की आहट ने भारतीय आईटी पेशेवरों के बीच चिंता की लहर पैदा कर दी है। हालिया प्रस्तावों के अनुसार, एच-1बी (H-1B) वीजा धारकों के लिए स्थायी निवास यानी 'ग्रीन कार्ड' प्राप्त करने की प्रक्रिया को और अधिक जटिल बनाया जा सकता है। यह कदम विशेष रूप से उन हजारों भारतीयों को प्रभावित करेगा जो दशकों से अमेरिका को अपना कार्यस्थल बनाए हुए हैं और भविष्य में वहां बसने का सपना देख रहे हैं।
प्रस्तावित नियमों का मुख्य उद्देश्य विदेशी पेशेवरों पर निर्भरता कम करना और स्थानीय अमेरिकी कार्यबल को प्राथमिकता देना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये बदलाव लागू होते हैं, तो न केवल नए आवेदकों के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी, बल्कि जो लोग पहले से ही प्रतीक्षा सूची (Backlog) में हैं, उनके लिए भी अनिश्चितता बढ़ जाएगी। वर्तमान में, ग्रीन कार्ड के लिए 'कंट्री कैप' (प्रति देश सीमा) के कारण भारतीयों को पहले से ही दशकों का इंतजार करना पड़ता है, और नए नियम इस प्रतीक्षा अवधि को और भी बढ़ा सकते हैं।
भारतीय तकनीकी समुदाय के लिए यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका में काम करने वाले अधिकांश एच-1बी वीजा धारक भारतीय मूल के हैं। इन नियमों का सीधा असर उनके आश्रितों (H-4 वीजा धारकों) पर भी पड़ेगा, जिनमें उनके जीवनसाथी और बच्चे शामिल हैं। कई मामलों में, अमेरिका में पले-बढ़े बच्चे 'एजिंग आउट' (aging out) की समस्या का सामना कर सकते हैं, जिससे 21 वर्ष की आयु के बाद उनके वहां रहने पर कानूनी संकट आ सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका की इन सख्त नीतियों का असर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर भी पड़ सकता है। आईसीएन24 (ICN24) के विश्लेषण के अनुसार, जब भी अमेरिका अपने आव्रजन नियमों को सख्त करता है, तो कुशल भारतीय प्रतिभाएं ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूके जैसे देशों का रुख करती हैं। ऑस्ट्रेलिया की 'ग्लोबल टैलेंट वीजा' और 'पॉइंट्स-बेस्ड सिस्टम' उन आईटी प्रोफेशनल्स के लिए एक आकर्षक विकल्प बनकर उभरे हैं जो अमेरिका की अनिश्चितता से बचना चाहते हैं।
हालांकि, अभी ये प्रस्ताव चर्चा के चरण में हैं, लेकिन इसने सिलिकॉन वैली से लेकर बेंगलुरु तक के टेक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय और विभिन्न प्रवासी संगठन इस स्थिति पर पैनी नजर रख रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि अमेरिका ने अपनी आव्रजन नीति में लचीलापन नहीं दिखाया, तो वह दुनिया की बेहतरीन तकनीकी प्रतिभाओं को खो सकता है, जिसका लाभ अन्य विकसित राष्ट्र उठाएंगे।
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