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स्विट्जरलैंड ने '10 मिलियन आबादी' की सीमा का प्रस्ताव ठुकराया, यूरोपीय संघ के साथ श्रम समझौतों को दी प्राथमिकता
ICN24 Newsroom 15 जून 2026, 10:31 am

स्विस मतदाताओं ने देश की आबादी को 1 करोड़ तक सीमित करने के दक्षिणपंथी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिससे यूरोपीय संघ के साथ मुक्त आवाजाही बनी रहेगी।
स्विट्जरलैंड के नागरिकों ने देश की आबादी को 10 मिलियन (एक करोड़) तक सीमित करने के विवादास्पद प्रस्ताव को भारी बहुमत से खारिज कर दिया है। इस जनमत संग्रह के परिणाम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्विस जनता आर्थिक स्थिरता और यूरोपीय संघ (EU) के साथ अपने प्रगाढ़ संबंधों को किसी भी तरह के आप्रवासन प्रतिबंधों से ऊपर रखती है। दक्षिणपंथी स्विस पीपुल्स पार्टी (SVP) द्वारा समर्थित इस पहल का उद्देश्य 2050 तक जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगाना था, ताकि देश के संसाधनों और बुनियादी ढांचे पर दबाव कम किया जा सके।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, लगभग 60 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता, तो स्विट्जरलैंड को यूरोपीय संघ के साथ 'फ्री मूवमेंट' यानी मुक्त आवाजाही के समझौते को रद्द करना पड़ता। स्विस सरकार और उद्योग जगत के नेताओं ने चेतावनी दी थी कि ऐसे कदम से न केवल श्रम शक्ति की भारी कमी हो जाएगी, बल्कि पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक संबंधों में भी दरार आ जाएगी।
इस घटनाक्रम का महत्व केवल स्विट्जरलैंड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर विकसित देशों में चल रही आप्रवासन संबंधी बहस को भी दर्शाता है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी, जहां भारतीय समुदाय एक बड़ी और प्रभावशाली भूमिका निभाता है, बुनियादी ढांचे और आवास संकट को लेकर आप्रवासन पर अंकुश लगाने की मांग उठती रही है। हालांकि, स्विट्जरलैंड का यह फैसला बताता है कि कुशल श्रमिकों की कमी से जूझ रही अर्थव्यवस्थाओं के लिए प्रवासियों का आगमन कितना अनिवार्य है।
स्विस अधिकारियों ने तर्क दिया कि देश की आर्थिक प्रगति विदेशी श्रमिकों पर टिकी है। विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा, प्रौद्योगिकी और निर्माण क्षेत्रों में प्रवासियों की कमी देश को मंदी की ओर धकेल सकती थी। विपक्षी दलों ने भी तर्क दिया कि जनसंख्या पर कृत्रिम सीमा लगाने से नवाचार और प्रतिस्पर्धात्मकता को नुकसान होगा। स्विट्जरलैंड की वर्तमान आबादी लगभग 90 लाख है, जिसमें से लगभग एक चौथाई विदेशी मूल के हैं।
भारतीय मूल के पेशेवरों के लिए, जो यूरोप या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बसने की इच्छा रखते हैं, यह निर्णय एक सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं अंततः व्यावहारिक जरूरतों को लोकलुभावन राजनीति से अधिक महत्व देती हैं। हालांकि आवास की बढ़ती कीमतें और सार्वजनिक सेवाओं पर बोझ एक वास्तविक चुनौती बनी हुई है, लेकिन पूर्ण प्रतिबंध के बजाय बेहतर प्रबंधन को ही दीर्घकालिक समाधान माना जा रहा है।
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