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विदेश में पढ़ाई और भारी भरकम एजुकेशन लोन: छिपी हुई लागत और वे गलतियां जो बढ़ा सकती हैं आपका कर्ज

ICN24 Newsroom 7 जून 2026, 01:00 pm
विदेश में पढ़ाई और भारी भरकम एजुकेशन लोन: छिपी हुई लागत और वे गलतियां जो बढ़ा सकती हैं आपका कर्ज

भारतीय परिवारों के लिए विदेश में शिक्षा अब ₹1 करोड़ तक पहुंच गई है। जानें कैसे एजुकेशन लोन की गलतियां आपके वित्तीय भविष्य को संकट में डाल सकती हैं।

भारतीय मध्यमवर्ग के परिवारों के लिए अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजना हमेशा से एक बड़ा सपना रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा दिलाने की इच्छा रखते हैं। हालांकि, डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत और विदेशों में बढ़ती ट्यूशन फीस ने इस सपने को एक बड़ी वित्तीय चुनौती में बदल दिया है। आज के समय में, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका या ब्रिटेन जैसे देशों में पढ़ाई का कुल खर्च ₹1 करोड़ तक पहुंच सकता है, जिससे एजुकेशन लोन लेना एक मजबूरी बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकप्रिय गंतव्यों के लिए छात्र वीजा के नियमों में हालिया सख्ती के बावजूद, भारतीय छात्रों का रुझान कम नहीं हुआ है। लेकिन, शिक्षा ऋण (Education Loan) लेते समय कई छात्र और उनके अभिभावक कुछ ऐसी बुनियादी गलतियां कर बैठते हैं, जो बाद में उनके लिए भारी वित्तीय बोझ बन जाती हैं। सबसे पहली और बड़ी गलती 'प्रोसेसिंग फीस' और 'छिपे हुए शुल्कों' को नजरअंदाज करना है। कई बैंक कम ब्याज दर का विज्ञापन तो करते हैं, लेकिन फाइलिंग शुल्क और बीमा प्रीमियम के जरिए भारी वसूली कर लेते हैं। मुद्रा विनिमय दर (Currency Exchange Rate) में उतार-चढ़ाव एक और बड़ा जोखिम है। जब छात्र लोन लेता है, तो वह रुपये में होता है, लेकिन खर्च डॉलर में करना पड़ता है। यदि पढ़ाई के दौरान रुपया और कमजोर होता है, तो ट्यूशन फीस और रहने का खर्च स्वतः ही बढ़ जाता है, जिससे स्वीकृत लोन की राशि कम पड़ सकती है। ऐसे में छात्रों को 'मार्जिन मनी' के प्रावधान को ध्यान से समझना चाहिए। एक और महत्वपूर्ण पहलू 'मोरेटोरियम पीरियड' या पुनर्भुगतान की अवधि है। आमतौर पर छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के एक साल बाद तक किस्तें चुकाने की छूट मिलती है, लेकिन इस दौरान भी साधारण ब्याज जुड़ता रहता है। यदि छात्र इस अवधि के दौरान कम से कम ब्याज का भुगतान करना शुरू कर दें, तो वे भविष्य में चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) के बड़े जाल से बच सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह समझना भी जरूरी है कि पार्ट-टाइम काम से केवल रहने का खर्च ही निकल पाता है, पूरी फीस भरना संभव नहीं होता। विशेषज्ञों की सलाह है कि लोन लेने से पहले छात्र को उस देश के 'पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा' नियमों और जॉब मार्केट की गहन जांच करनी चाहिए। सही योजना और वित्तीय सूझबूझ ही विदेश में पढ़ाई के सपने को एक सफल निवेश में बदल सकती है, वरना यह जीवन भर का कर्ज बन सकता है।
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