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ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ीं: TMC के तीन बैंक खातों पर लगी रोक, ₹440 करोड़ का लेनदेन ठप
ICN24 Newsroom 21 जून 2026, 02:57 am
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी के तीन बैंक खातों पर 'डेबिट फ्रीज' लगा दिया गया है, जिससे 440 करोड़ रुपये के लेनदेन पर रोक लग गई है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक मोर्चे पर चुनौतियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। ताजा घटनाक्रम में, पार्टी के संगठनात्मक और वित्तीय तंत्र पर नियंत्रण को लेकर जारी आंतरिक कलह ने एक गंभीर मोड़ ले लिया है। खबरों के मुताबिक, एक निजी क्षेत्र के बैंक में मौजूद टीएमसी के तीन मुख्य बैंक खातों को 'डेबिट फ्रीज' कर दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद पार्टी अब इन खातों से लगभग 440 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि नहीं निकाल पाएगी।
यह वित्तीय संकट ऐसे समय में आया है जब पार्टी के भीतर दो गुटों के बीच खींचतान चरम पर है। सूत्रों के अनुसार, पूर्व मंत्री अरूप बिस्वास और विपक्ष के नेता रिताब्रता बनर्जी के समर्थकों के बीच संगठन पर वर्चस्व को लेकर टकराव चल रहा है। इसी विवाद के बीच बैंक द्वारा खातों पर रोक लगाने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। बैंक खातों का 'डेबिट फ्रीज' होना दर्शाता है कि पार्टी के भीतर हस्ताक्षरित प्राधिकार (signing authority) या वित्तीय प्रबंधन को लेकर कोई तकनीकी या कानूनी विवाद उत्पन्न हुआ है, जिसके कारण बैंक ने एहतियातन यह कदम उठाया है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय, विशेष रूप से प्रवासी बंगाली समाज के लिए यह खबर काफी मायने रखती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति और वहां की शासन व्यवस्था का सीधा असर उन प्रवासी भारतीयों पर पड़ता है जिनके परिवार और निवेश राज्य में सक्रिय हैं। राजनीतिक अस्थिरता और पार्टी के भीतर इस तरह की वित्तीय रुकावटें अक्सर प्रशासनिक कामकाज और विकास परियोजनाओं को प्रभावित करती हैं, जिसे लेकर एनआरआई समुदाय हमेशा चिंतित रहता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ₹440 करोड़ की राशि का अटकना टीएमसी के आगामी राजनीतिक अभियानों और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के प्रबंधन के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। आमतौर पर किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव और संगठनात्मक विस्तार के लिए निरंतर धन की आवश्यकता होती है। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है, तो इससे पार्टी की कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल, टीएमसी नेतृत्व की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन पार्टी के भीतर इस गतिरोध को सुलझाने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं।
आंतरिक गुटबाजी का यह असर केवल वित्तीय लेनदेन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पार्टी की छवि पर भी सवाल खड़े कर रहा है। रिताब्रता बनर्जी और अरूप बिस्वास, दोनों ही पार्टी के कद्दावर नेता माने जाते हैं, और उनके बीच का यह टकराव ममता बनर्जी के लिए एक नई सिरदर्द बन गया है। अब देखना यह होगा कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस वित्तीय संकट और आपसी मतभेद को कैसे सुलझाता है, ताकि बैंक खातों पर लगी रोक हटाई जा सके।
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