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उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देहरादून में रह रहे पाकिस्तानी सिख परिवार के निर्वासन पर लगाई रोक

ICN24 Newsroom 13 जून 2026, 03:31 am
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देहरादून में रह रहे पाकिस्तानी सिख परिवार के निर्वासन पर लगाई रोक

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देहरादून में रह रहे एक पाकिस्तानी सिख परिवार को बड़ी राहत देते हुए उनके तत्काल निर्वासन पर रोक लगा दी है।

नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने देहरादून में रह रहे एक पाकिस्तानी सिख परिवार को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें परिवार को 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि इस परिवार से राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है, तो उन्हें देश से बाहर न निकाला जाए। यह मामला मंजीत सिंह और उनके परिवार से जुड़ा है, जो 2019 में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत से भारत आए थे। तब से यह परिवार देहरादून के वसंत विहार इलाके में 'लॉन्ग टर्म वीजा' (LTV) पर रह रहा है। विशेष रूप से, उनका यह वीजा दिसंबर 2026 तक वैध है। विवाद तब शुरू हुआ जब 31 मई को उत्तराखंड सरकार ने एक नोटिस जारी कर उन्हें तुरंत देश छोड़ने का आदेश दिया, जो उन्हें 2 जून को प्राप्त हुआ। अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील विकास कुमार गुगलानी ने दलील दी कि परिवार के पास 2026 तक का वैध वीजा है, इसलिए उन्हें तब तक भारत में रहने की अनुमति मिलनी चाहिए। परिवार में तीन बच्चे हैं, जिनमें बड़ी बेटी बी.टेक कर रही है, दूसरी बेटी बीडीएस की छात्रा है और एक छोटा बेटा है। वकील ने मानवीय आधार पर और वैध दस्तावेजों का हवाला देते हुए निर्वासन के आदेश को चुनौती दी। दूसरी ओर, राज्य सरकार की प्रतिनिधि स्वाति वर्मा ने तर्क दिया कि परिवार वर्तमान में जिस इलाके में रह रहा है, वहां भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) का मुख्यालय स्थित है। सरकार का दावा है कि इस संवेदनशील क्षेत्र में उनकी उपस्थिति सुरक्षा के लिहाज से चिंताजनक हो सकती है। इसी आधार पर सरकार ने उन्हें पाकिस्तान वापस भेजने की मांग की थी। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकील सौरव अधिकारी ने भी कोर्ट को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करें और यह स्पष्ट करें कि क्या वास्तव में परिवार से सुरक्षा को कोई खतरा है। कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 16 जून की तारीख तय की है। भारतीय मूल के प्रवासियों (जैसे ऑस्ट्रेलिया में बसे सिख समुदाय) के लिए यह मामला काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत में शरणार्थियों और अल्पसंख्यक प्रवासियों के अधिकारों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के बीच के संतुलन को दर्शाता है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे कई भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिक इस तरह के मामलों पर बारीकी से नजर रखते हैं, खासकर जब बात धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सुरक्षा की हो।
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