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छात्रों की डिजिटल निजता का पहरेदार कौन? स्कूलों में बच्चों के ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ पर उठ रहे गंभीर सवाल
ICN24 Newsroom 1 अग॰ 2026, 01:35 am

सोशल मीडिया के दौर में स्कूलों द्वारा बच्चों की तस्वीरें और वीडियो साझा करने से उनकी निजता खतरे में है। नागालैंड की एक घटना ने डिजिटल सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है।
आज के डिजिटल युग में बच्चे स्कूल की दहलीज लांघने से बहुत पहले ही इंटरनेट की दुनिया में अपने पदचिह्न (डिजिटल फुटप्रिंट) छोड़ना शुरू कर देते हैं। स्कूलों द्वारा वार्षिक उत्सवों, खेलकूद और कक्षा की गतिविधियों को सोशल मीडिया पर साझा करना एक आम चलन बन गया है। हालांकि, यह चलन अब बच्चों की निजता और उनके भविष्य की गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हाल ही में भारत के नागालैंड से सामने आई एक घटना ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है, जो दुनिया भर के भारतीय समुदायों, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया में रह रहे अभिभावकों के लिए भी एक चेतावनी है।
नागालैंड की डॉक्टर मैरी एन. ओड्यूओ ने एक ऐसी घटना साझा की जहां एक समावेशी स्कूल (Inclusive School) में एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के दौरे के बाद एक बच्चे की निजता का उल्लंघन हुआ। इन्फ्लुएंसर ने स्कूल की गतिविधियों का वीडियो बनाया और उसे ऑनलाइन साझा कर दिया। इसके बाद उस विशेष सहायता प्राप्त कर रहे बच्चे के परिवार को परिचितों के फोन आने लगे, जिससे परिवार को मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। यह घटना दर्शाती है कि कैसे एक निजी पारिवारिक निर्णय और बच्चे की स्थिति सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गई, जो कभी स्कूल की चारदीवारी से बाहर नहीं जानी चाहिए थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल और अभिभावकों के बीच का भरोसा अब डिजिटल दुनिया तक फैल गया है। ऑस्ट्रेलिया में भी, जहां ई-सेफ्टी (e-safety) को लेकर कड़े कानून हैं, भारतीय मूल के अभिभावक अक्सर बच्चों की ऑनलाइन उपस्थिति को लेकर चिंतित रहते हैं। डिजिटल कंटेंट की प्रकृति ऐसी होती है कि एक बार अपलोड होने के बाद इसे अनगिनत बार कॉपी, डाउनलोड और शेयर किया जा सकता है। यह नोटिस बोर्ड पर लगे किसी कागज जैसा नहीं है जिसे दो दिन बाद हटाया जा सके; यह इंटरनेट पर हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है।
कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो भारत का 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023' बच्चों की पहचान योग्य तस्वीरों और वीडियो को व्यक्तिगत डेटा के रूप में मान्यता देता है, जिसे विशेष सुरक्षा की आवश्यकता है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने भी स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं कि बच्चों से जुड़े किसी भी निर्णय में उनकी गरिमा और निजता सर्वोपरि होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन (UNCRC) भी प्रत्येक बच्चे की निजता के अधिकार की वकालत करता है।
समय आ गया है कि शैक्षणिक संस्थान अपनी डिजिटल मीडिया नीतियों पर पुनर्विचार करें। स्कूलों को यह तय करना होगा कि कब फोटो ली जाए, उसे कहां साझा किया जाए और उसकी पहुंच किन लोगों तक हो। सीखने का उत्सव मनाने का अर्थ यह कतई नहीं होना चाहिए कि बच्चे की निजता या उसके आत्मसम्मान के साथ समझौता किया जाए। भविष्य में बच्चों को उसी गरिमा और देखभाल के साथ याद किया जाना चाहिए जिसके साथ उन्हें शिक्षित किया गया है, न कि उनके बचपन के किसी ऐसे डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर जो उनके लिए बोझ बन जाए।
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