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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का छिपा हुआ चेहरा: तकनीक में बढ़ता लैंगिक भेदभाव और सामाजिक चुनौतियां

ICN24 Newsroom 5 अग॰ 2026, 09:37 pm
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का छिपा हुआ चेहरा: तकनीक में बढ़ता लैंगिक भेदभाव और सामाजिक चुनौतियां

एआई केवल एक तकनीकी नवाचार नहीं बल्कि सामाजिक पूर्वाग्रहों का दर्पण है, जो विशेष रूप से लैंगिक असमानता को बढ़ावा दे रहा है।

आज के युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। स्मार्टफोन के एल्गोरिदम से लेकर कार्यस्थलों पर भर्ती प्रक्रियाओं तक, एआई की मौजूदगी अब केवल एक विकल्प नहीं बल्कि एक वैश्विक वास्तविकता है। हालांकि, तकनीकी विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि एआई पूरी तरह से निष्पक्ष या तटस्थ नहीं है। वास्तव में, यह अक्सर हमारे समाज में गहराई से निहित सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पूर्वाग्रहों को ही दोहराता है और उन्हें बढ़ावा देता है। एआई प्रणालियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे उस डेटा पर आधारित होती हैं जो उन्हें प्रदान किया जाता है। यदि ऐतिहासिक डेटा में महिलाओं के प्रति भेदभाव रहा है या कुछ क्षेत्रों में उनकी भागीदारी कम रही है, तो एआई मॉडल इसी को 'मानक' मान लेते हैं। उदाहरण के लिए, भर्ती के लिए उपयोग किए जाने वाले एल्गोरिदम अक्सर पुरुष उम्मीदवारों को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि वे पुराने डेटा से सीखते हैं, जहां तकनीकी भूमिकाओं में पुरुषों का दबदबा था। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से प्रासंगिक है। ऑस्ट्रेलिया के आईटी और एसईटीईएम (STEM) क्षेत्रों में भारतीय प्रवासियों की एक बड़ी संख्या कार्यरत है। यदि एआई-आधारित भर्ती उपकरण या प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली लैंगिक रूप से पक्षपाती हैं, तो यह सीधे तौर पर समुदाय की महिलाओं के करियर विकास और वेतन समानता को प्रभावित कर सकता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई पेशेवरों को अक्सर दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जहां सांस्कृतिक बारीकियां और लैंगिक पहचान दोनों ही एल्गोरिदम की समझ से बाहर हो सकती हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि एआई का 'अदृश्य हाथ' केवल नौकरी तक ही सीमित नहीं है। यह विज्ञापन, ऋण मंजूरी और यहां तक कि स्वास्थ्य सेवाओं में भी सक्रिय है। जब कोई एल्गोरिदम महिलाओं को कम वेतन वाली नौकरियों के विज्ञापन दिखाता है या उन्हें पुरुषों की तुलना में कम क्रेडिट सीमा प्रदान करता है, तो यह असमानता के एक दुष्चक्र को जन्म देता है। यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब डेटा में भारतीय या दक्षिण एशियाई महिलाओं की विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को शामिल नहीं किया जाता है। इस संकट का समाधान केवल बेहतर कोडिंग में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक बदलाव में निहित है। टेक कंपनियों को अपनी एआई विकास टीमों में विविधता लाने की आवश्यकता है ताकि डेटा संग्रह के दौरान ही पूर्वाग्रहों की पहचान की जा सके। पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की मांग है। ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में, जहां नीति निर्माण में तकनीक का बड़ा हाथ है, वहां एआई नैतिकता पर सख्त नियमों की आवश्यकता है। अंततः, एआई केवल वही है जो हम उसे सिखाते हैं। यदि हम एक न्यायपूर्ण और समान समाज चाहते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य की तकनीक हमारे अतीत की गलतियों को न दोहराए। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय को भी इस डिजिटल बदलाव में सक्रिय रूप से शामिल होकर अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए ताकि तकनीक का लाभ बिना किसी भेदभाव के सभी को मिल सके।
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