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छत्तीसगढ़ में कम बारिश के बावजूद धान की बंपर पैदावार का फॉर्मूला: 'तार बोनी' और 'नैनो डीएपी' से बदलेगी किसानों की किस्मत
ICN24 Newsroom 8 जून 2026, 09:30 pm

छत्तीसगढ़ के कृषि विशेषज्ञों ने कम वर्षा में भी धान की अच्छी फसल के लिए 'तार बोनी' तकनीक और नैनो डीएपी के उपयोग को महत्वपूर्ण बताया है।
छत्तीसगढ़, जिसे भारत का 'धान का कटोरा' कहा जाता है, अब खेती की नई तकनीकों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में कम बारिश की स्थिति में भी धान का भरपूर उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए 'तार बोनी' (कतार पद्धति) और नैनो डीएपी (Nano DAP) का संयोजन एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह तकनीक न केवल मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखती है, बल्कि किसानों की लागत कम कर उनकी आय बढ़ाने में भी सहायक है।
पारंपरिक छिड़काव पद्धति के बजाय कतारबद्ध बुआई या 'तार बोनी' करने से पौधों के बीच समान दूरी बनी रहती है, जिससे उन्हें पर्याप्त धूप और हवा मिलती है। इस पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें खरपतवार नियंत्रण आसान हो जाता है और पौधों की जड़ें गहराई तक जाकर कम पानी में भी जीवित रह पाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अनिश्चित मानसून के दौर में यह पद्धति किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है।
तकनीकी नवाचार की बात करें तो नैनो डीएपी और नैनो यूरिया का उपयोग खेती की लागत को काफी हद तक कम कर रहा है। पारंपरिक खाद के भारी-भरकम कट्टों की जगह अब छोटी बोतलें ले रही हैं, जिनका परिवहन और छिड़काव आसान है। जैव उर्वरकों के संतुलित उपयोग के साथ जब नैनो उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है, तो मिट्टी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है, जो लंबे समय में टिकाऊ खेती के लिए आवश्यक है।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह विकास महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में भी भारतीय मूल के कई लोग कृषि क्षेत्र और एग्री-टेक स्टार्टअप्स से जुड़े हैं। छत्तीसगढ़ की यह पहल दिखाती है कि कैसे पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक नैनो-प्रौद्योगिकी का मिलन वैश्विक खाद्य सुरक्षा में योगदान दे सकता है। ऑस्ट्रेलिया के शुष्क क्षेत्रों में खेती करने वाले विशेषज्ञों के लिए भी भारत के इन छोटे प्रयोगों में बड़े सबक छिपे हैं।
राज्य सरकार और कृषि विभाग अब व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चला रहे हैं ताकि छोटे और सीमांत किसान भी इन तकनीकों को अपना सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान नैनो उर्वरकों और सही बुआई तकनीक का सही अनुपात में पालन करें, तो वे न केवल उत्पादन में 15-20 प्रतिशत की वृद्धि कर सकते हैं, बल्कि रासायनिक खाद पर होने वाले खर्च को भी आधा कर सकते हैं। यह कदम छत्तीसगढ़ के कृषि परिदृश्य को समृद्ध बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।
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