राजनीति
केरल में जातिवाद: वामपंथी शासन के बावजूद आखिर क्यों नहीं मिट सकी सामाजिक असमानता?
ICN24 Newsroom 8 जून 2026, 03:00 pm

शारिका थिरनगामा की नई किताब केरल के 'प्रगतिशील' होने के दावों पर सवाल उठाती है और बताती है कि क्यों दशकों के वामपंथी शासन के बाद भी यहाँ जातिवाद खत्म नहीं हुआ।
केरल को अक्सर भारत के सबसे प्रगतिशील राज्यों में से एक माना जाता है, जहाँ साक्षरता दर और स्वास्थ्य मानक अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं। लेकिन एक नई किताब 'द मॉन्स्टर इन योर पाथ: द प्राइवेट लाइफ ऑफ कास्ट इन इंडिया' में लेखिका शारिका थिरनगामा ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है: दशकों तक वामपंथी विचारधारा और कम्युनिस्ट शासन के प्रभाव में रहने के बावजूद, केरल अपनी सामाजिक व्यवस्था से जाति के प्रभाव को पूरी तरह खत्म करने में क्यों विफल रहा?
लेखिका के अनुसार, केरल का 'प्रगतिशील' ढांचा अक्सर जातिगत भेदभाव को मिटाने के बजाय उसे छिपाने का काम करता है। कम्युनिस्ट आंदोलनों ने आर्थिक समानता और वर्ग संघर्ष पर तो ध्यान केंद्रित किया, लेकिन उन्होंने जाति को एक स्वतंत्र सामाजिक समस्या के रूप में देखने के बजाय उसे केवल आर्थिक पिछड़ापन मान लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि सार्वजनिक जीवन में भले ही जाति का जिक्र कम होता हो, लेकिन निजी और सामाजिक संबंधों में यह आज भी गहराई से पैठी हुई है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह विमर्श विशेष रूप से प्रासंगिक है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में बसे मलयाली समुदाय के लोग अपनी उच्च शिक्षा और पेशेवर सफलता के लिए जाने जाते हैं। हालाँकि, प्रवासी भारतीयों के बीच भी जातिगत पहचान अक्सर वैवाहिक विज्ञापनों, सामुदायिक संगठनों और निजी मेलजोल के माध्यम से जीवित रहती है। यह किताब हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आधुनिकता और वामपंथी राजनीति वास्तव में जातिवाद का समाधान हैं, या ये केवल इसे एक नया मुखौटा प्रदान करती हैं।
थिरनगामा का तर्क है कि केरल में 'अछूत' समझे जाने वाले समुदायों को मुख्यधारा में शामिल तो किया गया, लेकिन उन्हें कभी भी वह सामाजिक गरिमा नहीं मिली जो ऊँची जातियों के पास है। राज्य के भूमि सुधारों ने दलितों को घर बनाने के लिए जमीन तो दी, लेकिन उन्हें बड़े कृषि क्षेत्रों और संसाधनों के स्वामित्व से दूर रखा गया। यह संरचनात्मक असमानता आज भी केरल के समाज में एक 'अदृश्य दानव' की तरह मौजूद है।
यह विश्लेषण उन दावों को चुनौती देता है जो केरल मॉडल को जातिविहीन समाज के उदाहरण के रूप में पेश करते हैं। लेखिका का मानना है कि जब तक जाति को एक निजी विषय मानकर छोड़ दिया जाएगा, तब तक इसका समूल विनाश संभव नहीं है। यह पुस्तक न केवल भारतीय राजनीति के छात्रों के लिए, बल्कि उन सभी प्रवासियों के लिए भी एक आईना है जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों और सामाजिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
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