राजनीति
चीन का ‘एथनिक यूनिटी’ कानून तिब्बती पहचान मिटाने की साजिश: सिक्योंग पेनपा सेरिंग
ICN24 Newsroom 11 जून 2026, 02:00 am

सीटीए प्रमुख पेनपा सेरिंग ने चीनी कानून की आलोचना करते हुए कहा कि बीजिंग तिब्बत की सांस्कृतिक और भाषाई विशिष्टता को खत्म करने का प्रयास कर रहा है।
नई दिल्ली: केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के प्रमुख (सिक्योंग) पेनपा सेरिंग ने चीन के हालिया ‘एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस प्रमोशन लॉ’ पर कड़ा प्रहार किया है। सेरिंग ने आरोप लगाया कि इस कानून का असली उद्देश्य तिब्बत की विशिष्ट पहचान, भाषा और संस्कृति को पूरी तरह समाप्त कर उन्हें मुख्यधारा की चीनी पहचान में मिला देना है। उन्होंने आगाह किया कि बीजिंग का यह कदम तिब्बती समाज की जड़ों पर प्रहार करने जैसा है।
सिक्योंग ने विस्तार से बताते हुए कहा कि चीन इस कानून की आड़ में मंदारिन भाषा को अनिवार्य बना रहा है। उनका तर्क है कि जब किसी समुदाय की भाषा छीनी जाती है, तो उस समाज का इतिहास और उसके सांस्कृतिक मूल्य भी धीरे-धीरे विलुप्त हो जाते हैं। सेरिंग के अनुसार, यह कानून केवल प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत तिब्बती युवाओं को उनकी पारंपरिक जड़ों से दूर किया जा रहा है।
इस संदर्भ में ऑस्ट्रेलिया में रह रहे तिब्बती और भारतीय समुदाय के लिए भी यह विषय काफी संवेदनशील है। ऑस्ट्रेलिया में एक बड़ा तिब्बती प्रवासी समुदाय (Diaspora) रहता है, जो अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिक भी तिब्बती मुद्दे को लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों के चश्मे से देखते हैं। सेरिंग का यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ एक नई बहस छेड़ सकता है।
पेनपा सेरिंग ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे तिब्बत में हो रहे सांस्कृतिक बदलावों पर नजर रखें। उन्होंने कहा कि चीन ‘जातीय एकता’ के नाम पर जो कानून ला रहा है, वह वास्तव में विविधता को खत्म करने का औजार है। तिब्बती प्रशासन का मानना है कि यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के पास अपनी विरासत का कोई निशान नहीं बचेगा।
चीनी नीतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि तिब्बत के भीतर धार्मिक स्वतंत्रता पर भी पाबंदियां बढ़ गई हैं। मठों और शिक्षण संस्थानों में कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा को थोपा जा रहा है। सेरिंग ने अंत में दोहराया कि तिब्बत का संघर्ष केवल राजनीतिक स्वायत्तता का नहीं, बल्कि अस्तित्व को बचाए रखने का संघर्ष है। उन्होंने भारत की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा से तिब्बती शरणार्थियों को अपनी संस्कृति संरक्षित करने का सुरक्षित स्थान दिया है, जो चीन की मौजूदा नीतियों के बिल्कुल विपरीत है।
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