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क्या भारत बना पाएगा अपना 'स्पेसएक्स'? भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स के सामने चुनौतियां और संभावनाएं

ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 05:26 pm
क्या भारत बना पाएगा अपना 'स्पेसएक्स'? भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स के सामने चुनौतियां और संभावनाएं

एलोन मस्क की स्पेसएक्स की सफलता के बाद अब दुनिया की नजरें भारत पर हैं। क्या स्काईरूट और अग्निकुल जैसे भारतीय स्टार्टअप वैश्विक स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल कर पाएंगे?

एलोन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) ने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक नई क्रांति ला दी है। आज स्पेसएक्स का मूल्यांकन लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, और इसका सबसे बड़ा कारण 'पुन: प्रयोज्य रॉकेट' (reusable rocket) तकनीक है। इस तकनीक ने अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने की लागत को काफी हद तक कम कर दिया है। अब दुनिया भर के विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भारत, जो अपनी कम लागत वाली अंतरिक्ष तकनीक के लिए जाना जाता है, अपना खुद का 'स्पेसएक्स' खड़ा कर सकता है? भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में हाल के वर्षों में बड़े बदलाव आए हैं। केंद्र सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी निवेश के लिए खोलने के फैसले ने नए स्टार्टअप्स के लिए रास्ते खोल दिए हैं। स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) और अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos) जैसे भारतीय स्टार्टअप्स इस दौड़ में सबसे आगे हैं। स्काईरूट ने विक्रम-एस रॉकेट के सफल प्रक्षेपण के साथ इतिहास रचा, जबकि अग्निकुल अपनी 3D-प्रिंटेड इंजन तकनीक के लिए चर्चा में है। ये कंपनियां मुख्य रूप से छोटे उपग्रहों के बाजार को लक्षित कर रही हैं, जो आने वाले समय में एक बड़ा वैश्विक बाजार बनने वाला है। हालांकि, स्पेसएक्स जैसी सफलता रातों-रात नहीं मिलती। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस स्तर तक पहुंचने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी (Capital), तकनीकी पैमाना (Scale) और निरंतर निष्पादन की आवश्यकता है। स्पेसएक्स को अमेरिकी सरकार और नासा (NASA) से भारी अनुबंध और समर्थन मिला, जिसने उसे शुरुआती दिनों में स्थिरता प्रदान की। भारत में भी इसरो (ISRO) अब निजी क्षेत्र के लिए एक संरक्षक की भूमिका निभा रहा है, लेकिन अभी भी निजी निवेशकों से भारी मात्रा में फंडिंग जुटाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर विशेष महत्व रखती है। हाल के वर्षों में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच अंतरिक्ष सहयोग बढ़ा है। 'ऑस्ट्रेलिया-इंडिया स्पेस ब्रिज' और गगनयान मिशन के लिए ऑस्ट्रेलिया द्वारा दिया जा रहा जमीनी समर्थन दोनों देशों के मजबूत होते संबंधों का प्रमाण है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में भारतीय मूल के कई इंजीनियर और वैज्ञानिक अब निजी अंतरिक्ष परियोजनाओं में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। अंततः, भारत में 'स्पेसएक्स' बनाने का सपना केवल रॉकेट लॉन्च करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए एक संपूर्ण इकोसिस्टम की आवश्यकता है, जिसमें निजी लॉन्च पैड, बीमा और अंतरिक्ष कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्र शामिल हों। यदि भारतीय स्टार्टअप्स को सही समय पर निवेश और वैश्विक बाजार तक पहुंच मिलती है, तो वह दिन दूर नहीं जब 'मेड इन इंडिया' रॉकेट वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करेंगे।
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