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एआई के लिए चेहरे किराए पर देने का बढ़ता बाजार: कमाई के साथ बढ़ा पहचान चोरी और डीपफेक का खतरा

ICN24 Newsroom 6 अग॰ 2026, 11:39 pm
एआई के लिए चेहरे किराए पर देने का बढ़ता बाजार: कमाई के साथ बढ़ा पहचान चोरी और डीपफेक का खतरा

एआई मार्केट में अब लोग अपने चेहरे किराए पर देकर हज़ारों कमा रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ पहचान चोरी और अवैध डीपफेक के खतरों को लेकर आगाह कर रहे हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में एक नया और चौंकाने वाला ट्रेंड सामने आया है, जहां लोग अपनी डिजिटल पहचान यानी अपने चेहरों को कमर्शियल इस्तेमाल के लिए किराए पर दे रहे हैं। चीन से शुरू हुआ यह मॉडल अब वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है, जिससे न केवल कमाई के नए रास्ते खुले हैं बल्कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और पहचान चोरी (Identity Theft) जैसे गंभीर खतरे भी पैदा हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बाजार में लोग अपने चेहरे का 'लाइसेंस' देकर 1,400 रुपये से लेकर 67,000 रुपये तक कमा रहे हैं। चीन की 'एक्ट-आईडी' (ActID) और 'न्यू क्लॉ' (New Clothe) जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में अग्रणी बनकर उभरी हैं। ये कंपनियां आम लोगों के चेहरों का एक डिजिटल कैटलॉग तैयार करती हैं, जहां फिल्म और विज्ञापन निर्माता उम्र, लिंग और विशेष लुक्स के आधार पर चेहरों का चयन करते हैं। एक बार चेहरा चुने जाने के बाद, उसे एआई तकनीक के जरिए शॉर्ट फिल्मों, विज्ञापनों और मोबाइल के लिए बनने वाले 'माइक्रोड्रामा' में इस्तेमाल किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इसमें व्यक्ति को खुद अभिनय करने की जरूरत नहीं होती; केवल उनका चेहरा ही 'सोर्स मटेरियल' के रूप में इस्तेमाल होता है, जबकि आवाज और शरीर एआई द्वारा निर्मित होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, एआई को असली चेहरों की जरूरत इसलिए पड़ रही है क्योंकि पूरी तरह से कंप्यूटर-जनरेटेड किरदार अक्सर एक जैसे और कृत्रिम दिखते हैं। दर्शक अब अधिक स्वाभाविक और विशिष्ट दिखने वाले पात्रों की मांग कर रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जनवरी से मार्च के बीच रिलीज हुए करीब 1.28 लाख माइक्रोड्रामा में से 95 प्रतिशत में किसी न किसी स्तर पर एआई का उपयोग किया गया है। यह चलन ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी प्रासंगिक है, जहां डिजिटल कंटेंट का उपभोग बहुत अधिक है और एआई कानून अभी भी शुरुआती चरणों में हैं। हालांकि, यह तकनीक जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही जोखिम भरी भी है। कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस क्षेत्र में अनुबंध (Contracts) अक्सर स्पष्ट नहीं होते। एक बार चेहरा डिजिटल डेटा में बदल गया, तो उसका भविष्य में एआई ट्रेनिंग के लिए अवैध इस्तेमाल होने की संभावना बनी रहती है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि 'फेस-स्वैपिंग' तकनीक का दुरुपयोग डीपफेक वीडियो बनाने और वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किया जा सकता है। बीजिंग इंटरनेट कोर्ट में हाल ही में आया एक मामला इस खतरे की पुष्टि करता है, जहां अभिनेत्री दिलरुबा दिलमुरात के चेहरे का एआई के जरिए अवैध इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने इसे इमेज राइट्स का उल्लंघन माना। भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में, जहां डेटा सुरक्षा कानून लगातार विकसित हो रहे हैं, वहां पहचान की इस 'डिजिटल नीलामी' से पहले सख्त नियमों की आवश्यकता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि लोग अपनी तस्वीरों और डिजिटल पहचान को साझा करने से पहले लाइसेंसिंग शर्तों को अच्छी तरह समझ लें।
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