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ग्रेट निकोबार परियोजना रणनीतिक हितों के लिए अहम, आलोचक ‘भौगोलिक अज्ञानता’ से ग्रस्त: सरकारी सूत्र

ICN24 Newsroom 10 जून 2026, 02:30 am
ग्रेट निकोबार परियोजना रणनीतिक हितों के लिए अहम, आलोचक ‘भौगोलिक अज्ञानता’ से ग्रस्त: सरकारी सूत्र

भारत सरकार के सूत्रों ने ग्रेट निकोबार परियोजना का बचाव करते हुए इसे हिंद महासागर में देश की सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए अनिवार्य बताया है।

नई दिल्ली: भारत सरकार ने ग्रेट निकोबार द्वीप समूह पर चल रही महत्वाकांक्षी विकास परियोजना का पुरजोर बचाव किया है। रक्षा मंत्रालय और सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह परियोजना न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि रणनीतिक रूप से भी भारत के भविष्य के लिए अनिवार्य है। सूत्रों ने उन आलोचकों को आड़े हाथों लिया है जो पर्यावरणीय चिंताओं के आधार पर इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि विरोध करने वाले लोग इस क्षेत्र की 'भौगोलिक और रणनीतिक वास्तविकता' से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। करीब 72,000 करोड़ रुपये की इस 'होलिस्टिक डेवलपमेंट ऑफ ग्रेट निकोबार आइलैंड' परियोजना के तहत एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक सैन्य-नागरिक दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा, एक गैस आधारित बिजली संयंत्र और एक टाउनशिप का निर्माण प्रस्तावित है। सरकारी सूत्रों का तर्क है कि ग्रेट निकोबार द्वीप की भौगोलिक स्थिति हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के मुहाने पर है, जहाँ से दुनिया का एक बड़ा व्यापारिक हिस्सा गुजरता है। रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस परियोजना के माध्यम से भारत अपनी समुद्री शक्ति को और मजबूत करेगा। उन्होंने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का विकास भारत की पहली रक्षा पंक्ति (First line of defence) के रूप में कार्य करेगा। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय और प्रवासी नागरिकों के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता सीधे तौर पर ऑस्ट्रेलिया और भारत के द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को प्रभावित करती है। पर्यावरणीय चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए सूत्रों ने स्पष्ट किया कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के लिए कड़े कदम उठाए गए हैं। आलोचकों का तर्क है कि इससे स्थानीय जनजातियों और जैव विविधता को नुकसान होगा, लेकिन सरकार का कहना है कि केवल 15% वन क्षेत्र का उपयोग किया जाएगा और इसकी भरपाई के लिए अन्य स्थानों पर वनीकरण किया जाएगा। सूत्रों ने इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम पर्यावरणीय कट्टरपंथ' की बहस बताते हुए कहा कि देश के व्यापक हितों को संकीर्ण वैश्विक एजेंडों के लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता। यह परियोजना न केवल दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के जुड़ाव को बढ़ाएगी बल्कि समुद्री व्यापार में भारत की हिस्सेदारी को भी कई गुना बढ़ा देगी। सरकार का लक्ष्य इस क्षेत्र को सिंगापुर और कोलंबो के विकल्प के रूप में विकसित करना है, जिससे भविष्य में हजारों रोजगार के अवसर पैदा होंगे और भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरेगा।
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