राजनीति
'आसमान नहीं गिर पड़ेगा अगर मदरसों में गाया जाए वंदे मातरम': कलकत्ता हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
ICN24 Newsroom 5 अग॰ 2026, 09:37 pm

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मदरसों में 'वंदे मातरम' गाने के मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि राष्ट्रीय गीत गाने से कोई अनर्थ नहीं होगा।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि पश्चिम बंगाल के मदरसों में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के सभी छह छंद गाए जाते हैं, तो इससे 'आसमान नहीं गिर पड़ेगा'। अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई जब वह राज्य के सहायता प्राप्त मदरसों में राष्ट्रीय गीत को अनिवार्य रूप से गाने की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा की पीठ ने मामले की संवेदनशीलता और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
यह मामला तब चर्चा में आया जब एक याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाई कि राज्य के सभी शिक्षण संस्थानों, विशेष रूप से मदरसों में राष्ट्रीय गीत के गायन को सुनिश्चित किया जाए। याचिका में तर्क दिया गया था कि राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है और इसे किसी विशेष धार्मिक संस्थान में गाने से किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए।
न्यायमूर्ति मंथा ने टिप्पणी की कि वंदे मातरम भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों को किसी विशेष विचारधारा या धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि भारतीय संविधान के तहत राष्ट्रीय गान (जन गण मन) और राष्ट्रीय गीत (वंदे मातरम) दोनों का एक विशिष्ट स्थान है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस संबंध में किसी भी प्रकार का आदेश देने से पहले सभी संवैधानिक पहलुओं और पिछले न्यायिक फैसलों को ध्यान में रखा जाएगा।
भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों और धार्मिक शिक्षा के बीच का यह विवाद अक्सर चर्चा का केंद्र रहता है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर विशेष महत्व रखती है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी भारतीय अक्सर अपनी सांस्कृतिक जड़ों और राष्ट्रीय पहचान को लेकर सजग रहते हैं। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय में इस तरह के कानूनी घटनाक्रमों को भारत में धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय अखंडता के बीच के संतुलन के रूप में देखा जाता है। वहां के बहुसांस्कृतिक समाज में रह रहे भारतीय मूल के लोग अक्सर इस बात पर बहस करते हैं कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली में पारंपरिक और राष्ट्रीय मूल्यों का समावेश कैसे किया जाए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ी है, क्योंकि यह राष्ट्रवाद को धार्मिक सीमाओं से ऊपर रखने का संकेत देती है। फिलहाल, अदालत ने राज्य सरकार से इस संबंध में उनकी नीति और मौजूदा नियमों पर जानकारी मांगी है। मामले की अगली सुनवाई में सरकार को अपना पक्ष रखना होगा कि क्या वर्तमान में मदरसों में इस तरह के गायन पर कोई रोक है या इसे स्वैच्छिक रखा गया है। यह निर्णय आने वाले समय में पश्चिम बंगाल के शिक्षा संस्थानों में राष्ट्रीय गीतों की स्थिति को स्पष्ट करेगा।
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