राजनीति
हिमाचल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: बहू के नाम घर होने पर भी सास को मिलेगा रहने का अधिकार
ICN24 Newsroom 6 अग॰ 2026, 06:37 pm

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत 'साझा गृहस्थी' में रहने का अधिकार मालिकाना हक से ऊपर है।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पारिवारिक विवादों और संपत्ति के अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम (Domestic Violence Act) के तहत, एक सास को अपनी बहू के नाम पर पंजीकृत घर में रहने का कानूनी अधिकार है। न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि बहू सिर्फ इस आधार पर अपनी सास को घर से बेदखल नहीं कर सकती कि वह मकान उसकी अपनी कमाई से खरीदा गया है या संपत्ति उसके नाम पर है।
अदालत ने अपने आदेश में 'साझा गृहस्थी' (Shared Household) की अवधारणा को विस्तार से समझाया। हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी संपत्ति में रहने का अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उस संपत्ति का कानूनी मालिक कौन है। यदि कोई परिवार एक साथ रह रहा है, तो वह स्थान 'साझा गृहस्थी' के दायरे में आता है। इस मामले में, बहू ने तर्क दिया था कि चूंकि उसने मकान अपनी मेहनत की कमाई से खरीदा है, इसलिए उसे अपनी सास को घर से बाहर निकालने का पूरा अधिकार है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया।
जस्टिस कैंथला ने टिप्पणी की कि कानून का उद्देश्य उन महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करना है जो घरेलू संबंधों में रही हैं। 'साझा गृहस्थी' के अधिकार के तहत यह अनिवार्य नहीं है कि संपत्ति पति, सास या स्वयं पीड़ित महिला के नाम पर हो। यदि पक्षकार किसी समय उस घर में एक साथ रहे हैं, तो वहां रहने का अधिकार बना रहता है। यह फैसला उन कई परिवारों के लिए नजीर बनेगा जहां संपत्ति विवाद के कारण बुजुर्गों को घर से निकालने की कोशिश की जाती है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह फैसला विशेष महत्व रखता है। प्रवासी भारतीयों (NRIs) के बीच अक्सर भारत में स्थित पैतृक या अर्जित संपत्तियों को लेकर कानूनी उलझनें बनी रहती हैं। कई मामलों में देखा गया है कि विदेशों में बसे बेटे-बहू भारत में रहने वाले माता-पिता के साथ संपत्ति विवाद में उलझ जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के नागरिक अक्सर संयुक्त परिवार की परंपराओं और आधुनिक संपत्ति कानूनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना करते हैं। हिमाचल हाई कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि भारतीय कानून बुजुर्गों के निवास के अधिकार को संपत्ति के कागजी हक से अधिक प्राथमिकता देता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय समाज में माता-पिता और बुजुर्गों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। अक्सर देखा जाता है कि कानूनी दांव-पेंच का सहारा लेकर बुजुर्गों को बेसहारा छोड़ दिया जाता है। इस फैसले के बाद, अब बहू या बेटे के नाम पर संपत्ति होने मात्र से सास-ससुर को उनके निवास स्थान से वंचित करना आसान नहीं होगा। अदालत ने यह भी साफ किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम का उद्देश्य केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि सुधारात्मक और सुरक्षात्मक भी है, ताकि परिवार के भीतर रहने वाले कमजोर सदस्यों के हितों की रक्षा की जा सके।
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