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कंडियाल गांव में 'हुणकोट देव' पूजन संपन्न: प्रवासी भारतीयों ने भी वर्चुअली साझा की अपनी परंपराएं
ICN24 Newsroom 6 जून 2026, 01:00 pm

टिहरी गढ़वाल के कंडियाल गांव में आयोजित दो दिवसीय वार्षिक हुणकोट देव पूजन समारोह का समापन हो गया, जिसमें बेटियों की भावुक विदाई और सामुदायिक एकता की झलक देखने को मिली।
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के अंतर्गत जाखणीधार विकासखंड के ग्राम सभा कंडियाल गांव में दो दिवसीय वार्षिक 'हुणकोट देव' पूजन समारोह का भव्य और भावुक समापन हुआ। इस धार्मिक आयोजन में स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ दूर-दराज के शहरों और विदेशों में रह रहे प्रवासियों ने भी अपनी जड़ों से जुड़ाव महसूस किया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण गांव की विवाहित बेटियों (ध्याणियों) का पुनर्मिलन और उनकी विदाई रही, जिसने न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक एकता का भी संदेश दिया।
समारोह की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप के साथ हुई। हुणकोट देवता को क्षेत्र के रक्षक के रूप में पूजा जाता है, और प्रतिवर्ष होने वाला यह आयोजन गांव की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है। पूजा के दौरान मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया था, जहां श्रद्धालुओं ने देवता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
इस आयोजन का सबसे भावुक क्षण वह था जब गांव की विवाहित बेटियां अपने मायके पहुंचीं। पहाड़ी संस्कृति में 'ध्याणियों' का विशेष महत्व है और इस पूजन के बहाने वे न केवल अपने परिवार से मिलती हैं, बल्कि अपनी परंपराओं को जीवित रखने में भी योगदान देती हैं। समापन अवसर पर जब इन बेटियों को उपहार और आशीर्वाद के साथ विदा किया गया, तो पूरे गांव की आंखें नम हो गईं।
ICN24 के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय के लोग अपनी इस तरह की लोक संस्कृति और देव-परंपराओं को बहुत याद करते हैं। प्रवासी उत्तराखंडी समुदाय अक्सर डिजिटल माध्यमों से इन आयोजनों से जुड़ते हैं। कंडियाल गांव के प्रवासियों ने बताया कि तकनीक के युग में वे वीडियो कॉल के जरिए पूजा में शामिल हुए, जो उन्हें अपनी मिट्टी से जोड़े रखता है।
आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि इस प्रकार के कार्यक्रम नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और रीति-रिवाजों से अवगत कराने का बेहतरीन माध्यम हैं। सामुदायिक भोज (भंडारे) के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ, जिसमें सैंकड़ों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। इस दो दिवसीय उत्सव ने एक बार फिर यह साबित किया कि भौगोलिक दूरियों के बावजूद, जड़ों से जुड़ाव ही पहाड़ की असली पहचान है।
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