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जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का प्रदर्शन: क्या 'जेन-जी' के दबाव में आएगी केंद्र सरकार?
ICN24 Newsroom 23 जुल॰ 2026, 02:35 am
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लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर सोनम वांगचुक का दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है, जिसे देश की युवा पीढ़ी का भारी समर्थन मिल रहा है।
नई दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर एक बार फिर विरोध प्रदर्शनों की गूंज सुनाई दे रही है। लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती पेश कर दी है। लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर शुरू हुआ यह मार्च अब केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसे भारत की युवा पीढ़ी यानी 'जेन-जी' (Gen Z) का अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है।
सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों ने लेह से दिल्ली तक की लगभग 1,000 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी की है। उनका मुख्य उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी (ecology) को औद्योगिक दोहन से बचाना और स्थानीय निवासियों को अपनी भूमि और संसाधनों पर निर्णय लेने का अधिकार दिलाना है। जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़ में बड़ी संख्या में छात्र और युवा पेशेवर देखे जा रहे हैं, जो सोशल मीडिया के माध्यम से इस आंदोलन की आवाज को वैश्विक स्तर पर पहुंचा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का आंदोलन पिछले प्रदर्शनों से अलग है क्योंकि इसमें पर्यावरण और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। 'जेन-जी' मतदाता, जो जलवायु परिवर्तन को अपनी प्राथमिकता मानते हैं, वांगचुक को एक रोल मॉडल के रूप में देख रहे हैं। दिल्ली की सीमाओं पर वांगचुक की हिरासत और बाद में उनकी रिहाई ने युवाओं के बीच सरकार के प्रति असंतोष को और गहरा कर दिया है। यह समर्थन केवल भारत तक सीमित नहीं है; ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रह रहे भारतीय समुदाय के युवा भी सोशल मीडिया पर लद्दाख के पर्यावरण और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं।
सरकार के लिए मुश्किल यह है कि लद्दाख रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो चीन और पाकिस्तान की सीमाओं से सटा है। एक ओर सरकार क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास को अपनी उपलब्धि बता रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि बिना स्थानीय भागीदारी के यह विकास विनाशकारी साबित हो सकता है। गृह मंत्रालय ने पहले भी लद्दाख के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की है, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है।
जैसे-जैसे जंतर-मंतर पर भीड़ बढ़ रही है, केंद्र सरकार पर दबाव भी बढ़ता जा रहा है। क्या सरकार युवाओं की इस ऊर्जा और वांगचुक की मांगों के आगे झुकेगी, या बातचीत का कोई बीच का रास्ता निकाला जाएगा? सिडनी और मेलबर्न में बसे प्रवासी भारतीयों की नजरें भी इस घटनाक्रम पर टिकी हैं, क्योंकि वे हिमालय के पर्यावरण को वैश्विक धरोहर के रूप में देखते हैं। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि 'दिल्ली चलो' का यह नारा लद्दाख के भविष्य के लिए कौन सा नया अध्याय लिखता है।
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