राजनीति
जम्मू-कश्मीर की राजनीति: दोराहे पर खड़ा जनमत या सियासी रंजिशों का नया अखाड़ा?
ICN24 Newsroom 8 जून 2026, 12:00 pm

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार के दो साल पूरे होने से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। पंचायत चुनावों की आहट और उपचुनावों में हार ने गठबंधन की चिंता बढ़ा दी है।
जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद निर्वाचित पहली सरकार अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) सरकार 16 अक्टूबर को अपने कार्यकाल के दो साल पूरे करने जा रही है। हालांकि, इन दो सालों में जनता की उम्मीदें और जमीनी हकीकत के बीच की खाई बढ़ती नजर आ रही है। राज्य की राजनीति इस समय एक ऐसी स्थिति में है जहाँ पुरानी प्रतिद्वंद्विता और नए चुनावी समीकरणों ने जनता को ऊहापोह में डाल दिया है।
हाल के घटनाक्रमों ने सत्ताधारी दल की चिंताएं बढ़ा दी हैं। राज्यसभा चुनाव और नगरोटा व बडगाम विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनावों के नतीजों ने विपक्ष को संजीवनी दे दी है। नगरोटा में भाजपा ने अपनी पकड़ बनाए रखी, जबकि बडगाम में पीडीपी (PDP) ने नेशनल कॉन्फ्रेंस को पटखनी देकर यह संकेत दिया कि घाटी में भी समीकरण बदल रहे हैं। राज्यसभा चुनावों में भी कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद एनसी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जिसने गठबंधन के भीतर की दरारों को भी उजागर कर दिया है।
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इस समय ‘चुनावी शोर’ और ‘जनता की चुप्पी’ दो अलग-अलग दिशाओं में जा रहे हैं। जहाँ एक ओर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर निजी हमले और तीखी बयानबाजी कर रहे हैं, वहीं आम नागरिक बिजली की कीमतों, बेरोजगारी और पूर्ण राज्य के दर्जे जैसे मुद्दों पर समाधान का इंतजार कर रहा है। सत्ता पक्ष बार-बार यह तर्क दे रहा है कि पांच साल का जनादेश अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन विपक्ष इसे सरकार की विफलता बताकर 'भेड़ियों के झुंड' की तरह हमलावर है।
आने वाले समय में पंचायत और जिला विकास परिषद (DDC) के चुनाव होने की संभावना है। हालांकि आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है, लेकिन सभी दल इसकी तैयारी में जुट गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ पीडीपी और अन्य छोटे दल जल्द चुनाव की मांग कर रहे हैं, वहीं एनसी और भाजपा सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। दोनों ही प्रमुख दल जानते हैं कि ये चुनाव 2024 के जनादेश के बाद का पहला बड़ा लिटमस टेस्ट होंगे।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी जम्मू-कश्मीर की यह राजनीतिक अस्थिरता चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रवासी भारतीय अक्सर अपनी जड़ों से जुड़े मुद्दों, विशेषकर निवेश और सुरक्षा की स्थिति पर नजर रखते हैं। एनसी ने अब दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई है, जिसे विपक्ष ने एक राजनीतिक स्टंट करार दिया है। अब देखना यह है कि क्या यह सियासी शोर किसी सार्थक परिणाम में बदलेगा या फिर जम्मू-कश्मीर की जनता केवल एक और राजनीतिक ड्रामे की मूकदर्शक बनी रहेगी।
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