राजनीति
22 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के शख्स को किया बरी, कहा- 'यह न्याय की विफलता है'
ICN24 Newsroom 6 अग॰ 2026, 08:37 pm
ओडिशा के अर्जुन जानी को 22 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष पाया। तिहरे हत्याकांड में दोषी ठहराए गए जानी ने अपनी आधी उम्र जेल में बिता दी, जिसे अदालत ने सिस्टम की बड़ी हार बताया।
भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में ओडिशा के नबरंगपुर जिले के निवासी अर्जुन जानी को तिहरे हत्याकांड के आरोपों से बरी कर दिया है। अर्जुन जानी ने अपने जीवन के 22 साल जेल की सलाखों के पीछे बिताए, जिसके बाद अब अदालत ने माना है कि उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 'न्याय की विफलता' करार देते हुए भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की खामियों पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
यह मामला साल 2004 का है, जब नबरंगपुर के हिरली गांव में एक तिहरे हत्याकांड की घटना हुई थी। अर्जुन जानी को इस मामले में मुख्य आरोपी बनाया गया था। निचली अदालतों ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अपनी जवानी के दो दशक से अधिक समय जेल में बिताने के बाद, जानी ने अंततः न्याय के सर्वोच्च मंदिर का दरवाजा खटखटाया, जहां उनकी दलीलों को स्वीकार किया गया।
न्यायमूर्ति की पीठ ने मामले की समीक्षा करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष अर्जुन जानी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को इतने लंबे समय तक कैद में रखना मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह मामला दर्शाता है कि कैसे एक निर्दोष व्यक्ति सिस्टम की खामियों के कारण अपनी पूरी उम्र खो देता है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह खबर भारत की कानूनी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती है। प्रवासी भारतीय अक्सर भारत में अपने पीछे छूटे परिवारों और संपत्ति की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं, और न्यायिक प्रणाली में होने वाली ऐसी देरी उनके विश्वास को प्रभावित करती है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' (देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है) की कहावत इस मामले में सटीक बैठती है।
अर्जुन जानी की रिहाई ने एक बार फिर भारत में विचाराधीन कैदियों और दोषपूर्ण सजा के मामलों पर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति दो दशक बाद निर्दोष पाया जाता है, तो न केवल उसका जीवन बर्बाद होता है, बल्कि समाज का कानून पर से भरोसा भी कम होता है। अब सवाल यह उठता है कि अर्जुन जानी के जीवन के जो 22 साल नष्ट हुए, उसकी भरपाई कौन करेगा। क्या सरकार ऐसे मामलों में मुआवजे और पुनर्वास के लिए कोई ठोस नीति बनाएगी? फिलहाल, अर्जुन जानी अपने घर लौट चुके हैं, लेकिन एक 'हत्यारे' के टैग के साथ बिताए गए उनके 22 साल हमेशा भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक सवालिया निशान बने रहेंगे।
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