राजनीति
ममता बनर्जी के सामने बड़ा राजनीतिक संकट: तृणमूल कांग्रेस में बढ़ती बगावत ने खड़ा किया नेतृत्व पर सवाल
ICN24 Newsroom 11 जून 2026, 02:30 am

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ते असंतोष और आंतरिक कलह के कारण एक बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रही हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन के सबसे गंभीर संकटों में से एक का सामना कर रही हैं। पार्टी के भीतर से उठ रही विद्रोह की आवाजों ने न केवल टीएमसी की एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि बनर्जी के नेतृत्व को भी सीधी चुनौती दी है। हाल के घटनाक्रमों ने संकेत दिया है कि पार्टी का एक बड़ा धड़ा नेतृत्व की कार्यशैली और भविष्य की रणनीति से संतुष्ट नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर एक 'बागी गुट' सक्रिय हो गया है जो सांगठनिक ढांचे में बड़े बदलावों की मांग कर रहा है। यह असंतोष केवल निचले स्तर के कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी दबे स्वर में अपनी नाराजगी व्यक्त करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस कलह को जल्द नहीं सुलझाया गया, तो राज्य में सत्ताधारी दल को बड़े बिखराव का सामना करना पड़ सकता है।
इस संकट के बीच टीएमसी और कांग्रेस के बीच बढ़ती नजदीकियों की चर्चा भी तेज हो गई है। ऐसी खबरें हैं कि ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने और राज्य में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए कांग्रेस के साथ बेहतर समन्वय की रणनीति पर विचार कर रही हैं। हालांकि, पार्टी के भीतर का एक वर्ग इस संभावित गठबंधन को लेकर संशय में है, जिससे अनिश्चितता का माहौल और गहरा गया है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेष रूप से प्रवासी बंगालियों के लिए यह खबर काफी महत्वपूर्ण है। विदेशों में रहने वाला भारतीय समुदाय हमेशा से बंगाल की राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखता आया है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में सक्रिय बंगाली प्रवासी संगठनों के बीच इस अस्थिरता को लेकर चिंता देखी जा रही है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक स्थिरता सीधे तौर पर राज्य के विकास और निवेश को प्रभावित करती है।
फिलहाल, ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी को एकजुट रखने की है। उन्हें न केवल विपक्ष के हमलों का सामना करना है, बल्कि घर के भीतर उठ रही इन विरोधी लहरों को भी शांत करना होगा। आने वाले समय में बनर्जी द्वारा उठाए गए कदम यह तय करेंगे कि तृणमूल कांग्रेस अपनी साख बचा पाएगी या यह संकट पार्टी के लिए एक अस्तित्व की लड़ाई में बदल जाएगा।
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