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पुरी जगन्नाथ मंदिर को मिला बड़ा कानूनी संरक्षण: 'आनंद बाजार' और 'श्री पतितपावन' समेत तीन नामों का हुआ पेटेंट

ICN24 Newsroom 10 जून 2026, 10:00 pm
पुरी जगन्नाथ मंदिर को मिला बड़ा कानूनी संरक्षण: 'आनंद बाजार' और 'श्री पतितपावन' समेत तीन नामों का हुआ पेटेंट

पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने 'आनंद बाजार' और 'श्री पतितपावन' जैसे पवित्र नामों का पेटेंट हासिल कर लिया है, जिससे अब इनका व्यावसायिक दुरुपयोग नहीं हो सकेगा।

ओडिशा के पुरी में स्थित 12वीं सदी के ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ मंदिर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने मंदिर से जुड़े तीन प्रमुख नामों और चिह्नों के लिए आधिकारिक तौर पर पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) हासिल कर लिया है। इनमें 'आनंद बाजार', 'श्री पतितपावन' और स्वयं 'श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA)' का नाम शामिल है। मुख्य प्रशासक अरबिंद पाधी ने बुधवार को इस ऐतिहासिक उपलब्धि की पुष्टि करते हुए बताया कि 'इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी इंडिया' ने इन नामों के पंजीकरण को मंजूरी दे दी है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य मंदिर की पवित्रता को बनाए रखना और इन विशिष्ट नामों के अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगाना है। अब कोई भी निजी संस्था या व्यक्ति इन नामों का उपयोग बिना अनुमति के व्यापारिक लाभ के लिए नहीं कर सकेगा। मंदिर प्रशासन ने जानकारी दी है कि उन्होंने कुल 29 ऐसी विशिष्ट वस्तुओं और नामों की सूची तैयार की है जो सीधे तौर पर जगन्नाथ संस्कृति और मंदिर की परंपराओं से जुड़ी हैं। इनमें से वर्तमान में तीन को सुरक्षा मिल चुकी है, जबकि शेष के लिए प्रक्रिया जारी है। आनंद बाजार, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा भोजन बाजार माना जाता है और जहाँ 'महाप्रसाद' मिलता है, अब कानूनी रूप से मंदिर की संपत्ति के रूप में सुरक्षित है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय और विशेषकर ओडिया प्रवासियों के लिए यह खबर अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में जगन्नाथ भक्त बड़ी संख्या में रहते हैं, जहाँ अक्सर रथ यात्रा और अन्य उत्सवों के दौरान 'आनंद बाजार' जैसे शब्दों का भावनात्मक जुड़ाव देखा जाता है। सिडनी के जगन्नाथ मंदिर के अनुयायियों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। भक्तों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर जगन्नाथ संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के बीच, प्रतीकों और नामों की कानूनी सुरक्षा आवश्यक थी ताकि भविष्य में इनका दुरुपयोग रोका जा सके। विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानूनी सुरक्षा के बाद, मंदिर प्रशासन उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर सकेगा जो इन पवित्र नामों का उपयोग करके नकली उत्पाद बेचते हैं या भक्तों को भ्रमित करते हैं। यह कदम न केवल मंदिर की गरिमा को बढ़ाता है, बल्कि जगन्नाथ संस्कृति की मौलिकता को भी आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करता है।
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