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रोहिणी व्रत 2024: जून में इस दिन रखा जाएगा जैन धर्म का पवित्र व्रत, जानें महत्व और पूजा विधि

ICN24 Newsroom 8 जून 2026, 06:30 pm
रोहिणी व्रत 2024: जून में इस दिन रखा जाएगा जैन धर्म का पवित्र व्रत, जानें महत्व और पूजा विधि

जैन धर्म में विशेष महत्व रखने वाला रोहिणी व्रत जून माह में श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। जानें इसकी तिथि, महत्व और पूजा की विधि।

जैन धर्म में रोहिणी व्रत का विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह व्रत हर महीने उस दिन रखा जाता है जब रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है। जून 2024 में यह व्रत 16 जून को मनाया जाएगा। जैन समुदाय के परिवारों के लिए यह दिन आत्म-शुद्धि, त्याग और भगवान वासुपूज्य की आराधना का प्रतीक माना जाता है। भारत के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया में रह रहे प्रवासी भारतीय विशेष रूप से जैन समुदाय के लोग इस दिन को पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रोहिणी व्रत का पालन मुख्य रूप से सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है। माना जाता है कि इस व्रत को करने से न केवल जीवन के कष्ट दूर होते हैं, बल्कि साधक को कर्मों के बंधन से भी मुक्ति मिलती है। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में बने जैन मंदिरों में इस दिन विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित की जाती हैं, जहाँ श्रद्धालु एकत्र होकर मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन करते हैं। रोहिणी व्रत की पूजा विधि काफी व्यवस्थित और संयमित होती है। व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त होना चाहिए। इसके बाद भगवान वासुपूज्य की प्रतिमा की पूजा की जाती है। पूजा में धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। इस दिन सात्विक आहार का पालन करना अनिवार्य है और कई लोग निर्जला व्रत भी रखते हैं। व्रत का पारण तब किया जाता है जब रोहिणी नक्षत्र समाप्त होकर अगला नक्षत्र (मृगशिरा) शुरू होता है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय के लिए ऐसे व्रत न केवल अपनी जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से परिचित कराने का अवसर भी प्रदान करते हैं। सामुदायिक केंद्रों पर होने वाले आयोजनों में व्रत की कथा सुनाई जाती है, जो धैर्य और अनुशासन का संदेश देती है। जैन धर्म के ग्रंथों के अनुसार, जो महिलाएं या पुरुष लगातार तीन, पांच या सात वर्षों तक इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें विशेष फल की प्राप्ति होती है। अंततः, रोहिणी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानसिक शांति और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने का एक मार्ग है। व्यस्त आधुनिक जीवनशैली के बीच, यह व्रत व्यक्ति को रुककर आत्म-चिंतन करने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। जून में पड़ने वाला यह व्रत स्थानीय जैन संघों द्वारा भी बड़े स्तर पर प्रबंधित किया जा रहा है ताकि श्रद्धालु सामूहिक रूप से इसका पुण्य लाभ उठा सकें।
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