राजनीति
कला और संस्कृति का भविष्य: संपन्न वर्ग का सहयोग और शिक्षितों का प्रोत्साहन है अनिवार्य
ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 01:00 pm
प्रबंधन गुरु एन. रघुरामन के अनुसार, कला को जीवित रखने के लिए केवल प्रतिभा काफी नहीं है; इसके लिए संपन्न वर्ग के निवेश और शिक्षित समाज की सराहना की आवश्यकता है।
प्रसिद्ध प्रबंधन गुरु और स्तंभकार एन. रघुरामन ने कला और संस्कृति के संरक्षण को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। उनके हालिया विश्लेषण के अनुसार, किसी भी समाज में कला तभी फल-फूल सकती है जब उसे संपन्न वर्ग का आर्थिक सहयोग और शिक्षित वर्ग का बौद्धिक प्रोत्साहन प्राप्त हो। यह विचार विशेष रूप से उन समुदायों के लिए प्रासंगिक है जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर विदेशों में बसे हैं।
रघुरामन ने अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए बताया कि कैसे आईपीएल जैसे बड़े आयोजनों के समापन के बाद समाज में एक सांस्कृतिक शून्यता महसूस की जाती है। वे तर्क देते हैं कि ऐतिहासिक रूप से कला हमेशा 'रॉयल पैट्रोनेज' यानी राजसी संरक्षण पर निर्भर रही है। प्राचीन भारत में राजा-महाराजा कलाकारों को आश्रय देते थे, जिससे संगीत, नृत्य और चित्रकला की विभिन्न शैलियाँ विकसित हुईं। आधुनिक संदर्भ में, यह जिम्मेदारी अब कॉरपोरेट जगत और समाज के धनी व्यक्तियों पर है।
लेखक का मानना है कि केवल सरकारी सहायता से कला जीवित नहीं रह सकती। जब तक समाज का संपन्न वर्ग कलाकृतियों को खरीदने या कार्यक्रमों को प्रायोजित करने में गर्व महसूस नहीं करेगा, तब तक कलाकार आर्थिक तंगी से जूझते रहेंगे। इसके साथ ही, शिक्षित वर्ग की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें कला की समझ और उसे सराहने की दृष्टि भी शामिल होनी चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के संदर्भ में यह लेख एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। मेलबर्न, सिडनी और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में भारतीय प्रवासी अपनी संस्कृति को सहेजने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। यहाँ आयोजित होने वाले सांस्कृतिक उत्सवों और शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि समुदाय के सफल उद्यमी उन्हें कितना सहयोग देते हैं।
अंत में, रघुरामन यह स्पष्ट करते हैं कि कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज की पहचान है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी विरासत से जुड़ी रहे, तो हमें कला को एक निवेश के रूप में देखना होगा। संपन्न लोगों को दानदाता के रूप में आगे आना होगा और शिक्षित वर्ग को एक सक्रिय दर्शक के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। तभी कला का यह कारवां निरंतर आगे बढ़ पाएगा।
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