राजनीति
भारतीय उच्च वर्गीय नारीवाद की कड़वी सच्चाई: घरेलू श्रम की आउटसोर्सिंग और वर्ग-विभाजन पर छिड़ी बहस
ICN24 Newsroom 8 जून 2026, 01:30 pm

भारतीय शहरी महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और करियर की प्रगति अक्सर गरीब तबके की महिलाओं के श्रम पर टिकी होती है, जो घरेलू काम की जिम्मेदारी संभालती हैं।
भारत और दुनिया भर के भारतीय समुदायों में नारीवाद और महिला सशक्तिकरण को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन हालिया चर्चाओं ने इस विमर्श के एक अंधेरे पक्ष को उजागर किया है: वह है उच्च और मध्यम वर्गीय महिलाओं की स्वतंत्रता का आधार। विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि शहरी भारतीय महिलाओं की व्यावसायिक सफलता अक्सर दूसरी महिलाओं, जो मुख्य रूप से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों से आती हैं, के श्रम के 'आउटसोर्सिंग' पर निर्भर करती है।
यह विमर्श इस कड़वी हकीकत को सामने लाता है कि जब एक विशेषाधिकार प्राप्त महिला अपने करियर पर ध्यान केंद्रित करती है या अपने 'मी-टाइम' का आनंद लेती है, तो घर के चूल्हे-चौके और सफाई की जिम्मेदारी अक्सर एक ऐसी महिला के कंधों पर होती है जिसका अपना संघर्ष केवल उत्तरजीविता (सरवाइवल) तक सीमित है। इसे 'श्रम का राजनीतिकरण' न करते हुए इसे मात्र एक आर्थिक व्यवस्था मान लिया गया है, जिससे सामाजिक असमानता की जड़ें और गहरी हो जाती हैं।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह विषय काफी प्रासंगिक है। भारत में जहां घरेलू सहायता (डोमेस्टिक हेल्प) आसानी से और सस्ते में उपलब्ध है, वहीं ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में प्रवासियों को अक्सर 'सेल्फ-हेल्प' मॉडल पर निर्भर रहना पड़ता है। हालांकि, यहां भी संपन्न भारतीय परिवारों में घरेलू कार्यों के लिए भुगतान के आधार पर सहायता लेने का चलन बढ़ रहा है। अंतर केवल इतना है कि यहां श्रम कानून और न्यूनतम मजदूरी की शर्तें कड़ी हैं, जबकि भारत में यह क्षेत्र काफी हद तक असंगठित और शोषणकारी बना हुआ है।
नारीवाद का यह स्वरूप अक्सर उन महिलाओं की आवाजों को दबा देता है जो इन घरों में काम करती हैं। क्या एक महिला की आजादी दूसरी महिला की मजबूरी पर आधारित होनी चाहिए? इस सवाल ने अब अकादमिक और सामाजिक हलकों में जोर पकड़ लिया है। आलोचकों का कहना है कि जब तक घरेलू काम को गरिमापूर्ण और समान श्रम के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तब तक इसे केवल एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग का उपयोग माना जाएगा।
निष्कर्ष के तौर पर, यह बहस हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा नारीवाद समावेशी है? सच्ची समानता तभी संभव है जब हम उस अदृश्य श्रम को स्वीकार करें जो हमारे जीवन को आसान बनाता है। घर और कार्यस्थल के बीच संतुलन केवल कुछ चुनिंदा महिलाओं का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर वर्ग की महिला का अधिकार होना चाहिए।
संबंधित ख़बरें

राजनीति
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों के जबरन धर्मांतरण और विवाह पर HRFP का बड़ा कार्यक्रम, अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग
फैसलाबाद में मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्म-परिवर्तन के खिलाफ आवाज उठाई और कानूनी सुरक्षा की मांग की।
21 जून 2026, 03:56 am
राजनीति
आंध्र प्रदेश: पूर्व वाईएसआरसीपी विधायक बोल्ला ब्रह्मा नायडू की रैली को पुलिस ने रोका, पालनाडु में तनाव
आंध्र प्रदेश के पालनाडु जिले में पूर्व विधायक बोल्ला ब्रह्मा नायडू को रैली करने से रोके जाने के बाद पुलिस और वाईएसआरसीपी कार्यकर्ताओं के बीच भारी हंगामा हुआ।
21 जून 2026, 03:40 am

राजनीति
स्पेन के प्रधानमंत्री की पत्नी बेगोना गोमेज पर चलेगा भ्रष्टाचार का मुकदमा, अदालत का बड़ा फैसला
स्पेन की एक अदालत ने प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ की पत्नी बेगोना गोमेज के खिलाफ भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोपों में मुकदमा चलाने का आदेश दिया है।
21 जून 2026, 03:26 am

