राजनीति
गणतंत्र के 'परजीवी': क्या भारत की युवा पीढ़ी एक गहरे रोजगार संकट की ओर बढ़ रही है?
ICN24 Newsroom 7 जून 2026, 12:30 pm
भारत में रोजगार के घटते अवसरों ने युवाओं के बीच भारी असंतोष पैदा किया है, जो अब एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक चुनौती का रूप ले रहा है।
भारत की अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) पर बहस अब एक गंभीर मोड़ पर पहुँच गई है। हालिया सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में 'गणतंत्र के परजीवी' जैसे तीखे शब्दों का प्रयोग उस युवा वर्ग के लिए किया जा रहा है, जो योग्यता के बावजूद रोजगार के अभाव में हाशिए पर खड़ा है। 'कॉलेज ड्रॉपआउट्स' और स्नातक पास युवाओं की बढ़ती फौज इस बात का प्रमाण है कि देश में रोजगार के अवसर न केवल कम हो रहे हैं, बल्कि गुणवत्ता के मामले में भी गिर रहे हैं।
भारत की विशाल युवा आबादी, जिसे कभी विकास का इंजन माना जाता था, अब बेरोजगारी के गहरे दलदल में फंसी नजर आती है। सरकारी नौकरियों के प्रति बढ़ता जुनून और निजी क्षेत्र में असुरक्षित कार्य संस्कृति ने युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता पर गहरा प्रभाव डाला है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते कौशल विकास और औद्योगिक बुनियादी ढांचे में सुधार नहीं किया गया, तो यह स्थिति एक सामाजिक विस्फोट का कारण बन सकती है।
विशेष रूप से, उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में स्थिति अधिक चिंताजनक है। यहाँ का युवा वर्ग सेना, रेलवे और प्रशासनिक सेवाओं जैसी स्थायी नौकरियों पर निर्भर रहा है। हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों में भर्ती की प्रक्रिया में बदलाव और पदों की कटौती ने एक ऐसी हताशा को जन्म दिया है जिसे सीजेपी (CJP) जैसी घटनाएं और जन-आंदोलन रेखांकित कर रहे हैं। यह सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि एक पहचान का संकट भी है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह विषय अत्यंत प्रासंगिक है। कई भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया की ओर इसलिए रुख कर रहे हैं क्योंकि स्वदेश में उन्हें भविष्य धुंधला दिखाई दे रहा है। प्रवासी भारतीय (Diaspora) अपने पीछे छूटे परिवारों की स्थिति और भारत की इस उभरती चुनौती को लेकर चिंतित हैं। भारत से होने वाला कुशल और अकुशल श्रमिकों का पलायन सीधे तौर पर स्थानीय रोजगार नीतियों की विफलता को दर्शाता है।
निष्कर्षतः, भारत को अपनी आर्थिक नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। केवल जीडीपी (GDP) के आंकड़ों में वृद्धि से काम नहीं चलेगा; विकास का लाभ जमीनी स्तर पर रोजगार के रूप में दिखना चाहिए। 'गणतंत्र के परजीवी' वे युवा नहीं हैं जो नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं, बल्कि वे व्यवस्थागत खामियां हैं जो उनकी क्षमता का दोहन करने में विफल रही हैं।
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