राजनीति
कोल ब्लॉक आवंटन मामला: सुप्रीम कोर्ट से पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को बड़ी राहत, विशेष अदालत का समन रद्द
ICN24 Newsroom 29 जुल॰ 2026, 09:36 pm

सुप्रीम कोर्ट ने 11 साल पुराने कोल ब्लॉक मामले में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को बड़ी राहत देते हुए विशेष सीबीआई अदालत द्वारा जारी समन को पूरी तरह रद्द कर दिया है।
भारत के उच्चतम न्यायालय ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को एक दशक से अधिक पुराने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने विशेष सीबीआई अदालत द्वारा डॉ. सिंह को आरोपी के रूप में जारी किए गए समन को रद्द कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दाखिल की गई क्लोजर रिपोर्ट को भी स्वीकार कर लिया है।
यह मामला साल 2005 में ओडिशा के तालाबीरा-द्वितीय (Talabira II) कोयला ब्लॉक के आवंटन से जुड़ा है। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ कोयला मंत्रालय का प्रभार भी संभाल रहे थे। विशेष सीबीआई अदालत ने 2015 में उन्हें इस मामले में आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार के आरोपों के तहत तलब किया था। हालांकि, डॉ. सिंह ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां से उन्हें अब क्लीन चिट मिल गई है।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि डॉ. मनमोहन सिंह की छवि हमेशा से एक बेदाग और ईमानदार राजनेता की रही है। कोलगेट (Coalgate) के नाम से चर्चित इस घोटाले ने तत्कालीन यूपीए सरकार की साख को काफी नुकसान पहुंचाया था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अदालती फैसले से न केवल डॉ. सिंह की व्यक्तिगत निष्ठा की पुष्टि हुई है, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ है कि नीतिगत निर्णयों में प्रधानमंत्री की भूमिका को हमेशा आपराधिक इरादे से नहीं जोड़ा जा सकता।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष रुचि रखती है। डॉ. मनमोहन सिंह को 1991 के आर्थिक सुधारों के जनक के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापारिक संबंधों की नींव रखी थी। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में बसे प्रवासी भारतीयों के बीच डॉ. सिंह की बौद्धिक क्षमता और उनकी शालीन राजनीति के प्रशंसक आज भी मौजूद हैं। भारतीय प्रवासियों के लिए भारत की न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और पूर्व नेतृत्व की प्रतिष्ठा हमेशा चर्चा का विषय रहती है।
सीबीआई ने अपनी जांच में पाया था कि डॉ. सिंह के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं और इसी आधार पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई थी। हालांकि, निचली अदालत ने इसे पहले स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, 92 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री के ऊपर से इस लंबी कानूनी लड़ाई का बोझ हट गया है। यह निर्णय न केवल कांग्रेस पार्टी के लिए एक नैतिक जीत है, बल्कि भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के अंत का भी प्रतीक है।
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