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छत्तीसगढ़: गरियाबंद में डीईओ नियुक्ति पर उठा विवाद, वरिष्ठता नियमों की अनदेखी के आरोप

ICN24 Newsroom 5 अग॰ 2026, 11:37 pm
छत्तीसगढ़: गरियाबंद में डीईओ नियुक्ति पर उठा विवाद, वरिष्ठता नियमों की अनदेखी के आरोप

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) की नियुक्ति को लेकर विवाद गहरा गया है, जहां वरिष्ठता के नियमों की अनदेखी करने के गंभीर आरोप लगे हैं।

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) की पदस्थापना को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक पारदर्शिता और नियमों की व्याख्या पर गंभीर बहस छिड़ गई है। ताज़ा मामला गरियाबंद जिले का है, जहाँ डीईओ के पद पर की गई नियुक्ति ने विभाग के भीतर और बाहर असंतोष पैदा कर दिया है। यह विवाद मुख्य रूप से वरिष्ठता नियमों की अनदेखी और कनिष्ठ अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करने के आरोपों पर आधारित है। गरियाबंद में हुई इस पदस्थापना ने राज्य के प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। जानकारों का कहना है कि विभाग में कई ऐसे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं जो इस पद के लिए योग्य और अनुभवी हैं, लेकिन उन्हें दरकिनार कर दिया गया। यह मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। हाल ही में बलौदाबाजार-भाटापारा के प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश ने इस मुद्दे को और भी संवेदनशील बना दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक नियुक्तियों में नियमों और वरिष्ठता का पालन करना अनिवार्य है। इस विवाद का गहरा असर विभाग के मनोबल पर भी पड़ रहा है। जब वरिष्ठ अधिकारियों को उनकी सेवा अवधि और अनुभव के आधार पर उचित स्थान नहीं मिलता, तो इससे प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है। गरियाबंद के मामले में स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि क्या यह नियुक्तियां राजनीतिक प्रभाव में की गई हैं या प्रशासनिक चूक का परिणाम हैं। नियमतः, डीईओ जैसे महत्वपूर्ण पद पर अनुभवी और वरिष्ठ संवर्ग के अधिकारियों को ही नियुक्त किया जाना चाहिए ताकि जिले की शिक्षा व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे छत्तीसगढ़ी मूल के प्रवासियों के लिए भी यह खबर चिंता का विषय है। भारत में सुशासन और योग्यता आधारित नियुक्तियां विदेशी निवेश और प्रवासी भारतीयों के विश्वास को मजबूत करती हैं। जब राज्य की शिक्षा प्रणाली जैसे महत्वपूर्ण स्तंभ में नियमों की अवहेलना की खबरें आती हैं, तो इससे राज्य की छवि प्रभावित होती है। पारदर्शी शासन व्यवस्था न केवल स्थानीय नागरिकों के लिए आवश्यक है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी राज्य की साख को निर्धारित करती है। वर्तमान में, इस मुद्दे पर स्कूल शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या विभाग हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए अपनी गलती सुधारेगा या इस विवाद को इसी तरह बढ़ने दिया जाएगा? आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या राज्य सरकार इस मामले में हस्तक्षेप कर वरिष्ठता और योग्यता के सिद्धांतों को पुनः स्थापित करती है। शिक्षा विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि नियुक्तियां किसी भी तरह के संदेह से परे हों ताकि छात्रों और शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित हाथों में रहे।
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