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ज्ञानवापी और संभल विवाद: सुप्रीम कोर्ट के 'फॉर्मूले' पर हिंदू और मुस्लिम पक्ष असहमत, गहराया कानूनी गतिरोध
ICN24 Newsroom 14 जुल॰ 2026, 01:31 am

वाराणसी की ज्ञानवापी और संभल मस्जिद जैसे संवेदनशील मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए समझौते के प्रस्ताव को हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने ठुकरा दिया है।
भारत की शीर्ष अदालत, उच्चतम न्यायालय ने वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल की जामा मस्जिद जैसे संवेदनशील धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए एक नया 'फॉर्मूला' प्रस्तावित किया था। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर न तो हिंदू पक्ष संतुष्ट नजर आ रहा है और न ही मुस्लिम पक्ष। इस असहमति ने इन ऐतिहासिक और धार्मिक विवादों के समाधान की प्रक्रिया को एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में डाल दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने हालिया सुनवाई के दौरान एक ऐसा रास्ता निकालने की कोशिश की थी जिससे अदालती कार्यवाही और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन बनाया जा सके। कोर्ट का विचार था कि इन मामलों में सर्वेक्षण (सर्वे) और कानूनी दावों को एक सुव्यवस्थित ढांचे के तहत लाया जाए ताकि बार-बार निचली अदालतों में होने वाली याचिकाओं से बचा जा सके। लेकिन दोनों ही पक्षों ने इस मध्यस्थता या समझौते के संकेत वाले प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।
हिंदू पक्ष का तर्क है कि पुरातात्विक साक्ष्य और ऐतिहासिक सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। उनका मानना है कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण (जैसे एएसआई सर्वे) के माध्यम से ही न्याय संभव है। हिंदू याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी भी प्रकार का 'फॉर्मूला' उनके उस कानूनी अधिकार को कमतर नहीं कर सकता, जो उन्हें अपने आराध्य के मूल स्थान को प्राप्त करने का हक देता है।
दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष का रुख पूरी तरह से 'पूजा स्थल अधिनियम, 1991' (Places of Worship Act, 1991) पर टिका है। उनका कहना है कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता। मुस्लिम संगठनों का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट का कोई भी नया फॉर्मूला अगर 1991 के कानून की अनदेखी करता है, तो वह उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। उन्हें डर है कि सर्वेक्षणों की अनुमति देना ही इस कानून की भावना के खिलाफ है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी ये घटनाक्रम विशेष महत्व रखते हैं। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी भारतीय, जो भारत की सांस्कृतिक और कानूनी व्यवस्था से गहरे जुड़े हुए हैं, इन मामलों को बड़ी उत्सुकता से देख रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फॉर्मूले का खारिज होना यह दर्शाता है कि दोनों पक्ष अब केवल न्यायिक फैसले का इंतजार करना चाहते हैं, न कि किसी आपसी सहमति का।
अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। क्या कोर्ट कोई सख्त रुख अपनाएगा या फिर इन मामलों को लंबी कानूनी प्रक्रिया के लिए निचली अदालतों पर छोड़ देगा? फिलहाल, ज्ञानवापी से लेकर संभल तक, तनावपूर्ण शांति और कानूनी दांव-पेंच का दौर जारी है।
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