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‘अगर नहीं लौटा तो भूत बनकर आऊंगा...’ अनशन के 20वें दिन सोनम वांगचुक का बड़ा ऐलान
ICN24 Newsroom 17 जुल॰ 2026, 07:33 pm

दिल्ली के जंतर-मंतर पर लद्दाख के लिए छठी अनुसूची की मांग को लेकर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक ने 20वें दिन भावुक और कड़ा संदेश दिया है।
देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का आज 20वां दिन है। कड़ाके की ठंड और गिरते स्वास्थ्य के बावजूद वांगचुक के इरादे कमज़ोर होते नहीं दिख रहे हैं। लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर वह पिछले कई दिनों से केवल पानी पर जीवित हैं। इसी बीच उन्होंने एक ऐसा बयान दिया है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
अनशन स्थल से समर्थकों को संबोधित करते हुए वांगचुक ने कहा, "अगर मैं इस संघर्ष में सफल नहीं हुआ और मेरा शरीर शांत हो गया, तो भी मेरा संकल्प नहीं टूटेगा। अगर मैं जीवित वापस नहीं लौटा, तो मैं एक भूत बनकर वापस आऊंगा और लद्दाख के अधिकारों के लिए अपनी आवाज उठाता रहूंगा।" उनके इस बयान को उनकी अटूट इच्छाशक्ति और केंद्र सरकार के प्रति उनके गहरे असंतोष के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई केवल लद्दाख के लिए नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण को बचाने की लड़ाई है।
सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों की मुख्य मांग लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देना और इसे छठी अनुसूची के तहत संरक्षित करना है। छठी अनुसूची के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्तता मिलती है, जिससे वे अपनी जमीन, संस्कृति और संसाधनों का संरक्षण खुद कर सकते हैं। वांगचुक का तर्क है कि लद्दाख की पारिस्थितिकी बहुत नाजुक है और औद्योगिक गतिविधियों से इसे अपूरणीय क्षति हो सकती है। सरकार ने पहले इन मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया था, लेकिन ठोस कदम न उठाए जाने के कारण वांगचुक को दिल्ली तक पैदल मार्च और अब अनशन का रास्ता चुनना पड़ा।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर विशेष महत्व रखती है। प्रवासी भारतीयों का एक बड़ा वर्ग हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर सजग है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रहने वाले लद्दाखी और भारतीय मूल के लोग सोशल मीडिया के माध्यम से वांगचुक को अपना समर्थन दे रहे हैं। उनका मानना है कि दुनिया के 'तीसरे ध्रुव' (Third Pole) के रूप में जाने जाने वाले हिमालय का संरक्षण वैश्विक जलवायु संतुलन के लिए अनिवार्य है।
फिलहाल, डॉक्टरों ने वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर चिंता जताई है। जंतर-मंतर पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और बड़ी संख्या में छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता उनके समर्थन में पहुंच रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या सरकार 20 दिनों से जारी इस गतिरोध को तोड़ने के लिए कोई ठोस प्रस्ताव सामने रखती है या वांगचुक का यह अनशन किसी और बड़े आंदोलन का रूप लेगा।
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