शिक्षा
एनसीईआरटी का बड़ा फैसला: स्कूली किताबों में अब दिखेगी 'डांसिंग गर्ल' की मूल तस्वीर, विवाद के बाद बदलाव
ICN24 Newsroom 16 जून 2026, 10:31 pm

एनसीईआरटी ने कक्षा 9 की किताब में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध मूर्ति के साथ की गई छेड़छाड़ को सुधारने का निर्णय लिया है।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने हालिया विवाद के बाद कक्षा 9 की कला शिक्षा की पाठ्यपुस्तकों में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध 'डांसिंग गर्ल' (नर्तकी) की मूल छवि को बहाल करने का निर्णय लिया है। यह कदम तब उठाया गया जब शिक्षाविदों और इतिहासकारों ने इस प्रतिष्ठित कांस्य मूर्ति के डिजिटल चित्रण में बदलाव किए जाने पर आपत्ति जताई थी।
हाल ही में प्रकाशित कक्षा 9 की पुस्तक 'इंटरप्रिटिंग इंडियन आर्ट' में इस मूर्ति के मूल स्वरूप को बदलकर उसे ढकने की कोशिश की गई थी, जबकि कक्षा 6 की इतिहास की नई किताबों में इसकी मूल छवि का ही उपयोग किया गया है। मोहनजो-दड़ो से प्राप्त यह लगभग 4,500 साल पुरानी मूर्ति भारतीय इतिहास और कला का एक अमूल्य प्रतीक मानी जाती है। इतिहासकारों का तर्क है कि ऐतिहासिक कलाकृतियों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ उनके पुरातात्विक महत्व और उस काल की सांस्कृतिक वास्तविकता को कम करती है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय और प्रवासी अभिभावकों के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है। ऑस्ट्रेलिया के बहुसांस्कृतिक पाठ्यक्रम में अक्सर प्राचीन सभ्यताओं का अध्ययन किया जाता है, और वहां बसे भारतीय मूल के परिवार चाहते हैं कि उनके बच्चों को भारत की समृद्ध विरासत का सटीक ज्ञान मिले। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में चल रहे भारतीय हेरिटेज स्कूलों में भी एनसीईआरटी की सामग्री का संदर्भ के रूप में उपयोग किया जाता है, ऐसे में तथ्यों की सटीकता वैश्विक स्तर पर भारतीय इतिहास की छवि को प्रभावित करती है।
एनसीईआरटी के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि भविष्य के संस्करणों में इस त्रुटि को सुधारा जाएगा और छात्रों को वही ऐतिहासिक छवि दिखाई जाएगी जो संग्रहालयों में सुरक्षित है। यह मूर्ति वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में रखी गई है और इसे हड़प्पा संस्कृति की धातु शिल्प कला का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है।
सिंधु घाटी सभ्यता के अध्ययन में यह मूर्ति न केवल कलात्मक बल्कि सामाजिक संरचना को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूली पाठ्यक्रम में ऐतिहासिक सत्यता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए, ताकि भावी पीढ़ी इतिहास को उसके वास्तविक स्वरूप में समझ सके। इस सुधार के फैसले का शैक्षणिक जगत में स्वागत किया जा रहा है, क्योंकि यह भारत की प्राचीन और उदार सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
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