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मुंबई की चमक और खंडवा की माटी: सुरों के सम्राट किशोर कुमार की अपनी जड़ों से कभी न टूटने वाली अटूट डोर
ICN24 Newsroom 23 जुल॰ 2026, 10:35 am

भारतीय संगीत के दिग्गज किशोर कुमार की आवाज आज भी दुनिया भर में गूँजती है, लेकिन मुंबई की शोहरत के बीच उनका दिल हमेशा अपनी जन्मभूमि खंडवा के लिए धड़कता रहा।
भारतीय पार्श्व गायन के इतिहास में किशोर कुमार एक ऐसा नाम है, जिसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती। उनकी आवाज में वो जादू था जिसने न केवल सात दशकों तक भारतीय सिनेमा पर राज किया, बल्कि आज भी ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय प्रवासियों के बीच उनकी लोकप्रियता वैसी ही बनी हुई है। किशोर कुमार ने मुंबई की मायानगरी में सफलता के वो शिखर छुए, जो किसी भी कलाकार के लिए एक सपना होते हैं, लेकिन इस बेपनाह शोहरत और चकाचौंध के बीच भी उनका दिल हमेशा मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर खंडवा के लिए धड़कता रहा।
आभास कुमार गांगुली से किशोर कुमार बनने का सफर संघर्ष और प्रतिभा की अनूठी मिसाल है। उन्होंने अभिनय से लेकर गायन, निर्देशन और पटकथा लेखन तक हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी। हालांकि, मुंबई ने उन्हें नाम, पैसा और शोहरत दी, लेकिन किशोर दा खुद को हमेशा 'खंडवा वाला' ही कहते रहे। यह उनकी अपनी जड़ों के प्रति गहरी संवेनशीलता ही थी कि उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों पर यह इच्छा व्यक्त की थी कि वे अपने जीवन के अंतिम दिन खंडवा के बागों और गलियों में बिताना चाहते हैं।
खंडवा के प्रति उनके लगाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अक्सर रिकॉर्डिंग के बीच में भी अपनी मिट्टी को याद करते थे। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति 'दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे' आज भी उनके प्रशंसकों की जुबां पर है। यह केवल एक जुमला नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने की एक तड़प थी। भले ही व्यावसायिक मजबूरियों ने उन्हें मुंबई में रोके रखा, लेकिन उनकी आत्मा हमेशा उसी छोटे से शहर में रमी रही जहाँ उनका बचपन बीता था।
13 अक्टूबर 1987 को जब संगीत की यह महान हस्ती दुनिया को अलविदा कह गई, तो उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनका अंतिम संस्कार मुंबई के बजाय खंडवा में ही किया गया। यह उनके प्रशंसकों के लिए एक भावुक क्षण था, क्योंकि उन्होंने अपनी मौत के बाद भी साबित कर दिया कि एक कलाकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसकी असली पहचान उसकी मिट्टी से ही होती है।
आज जब सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे ऑस्ट्रेलियाई शहरों में किशोर कुमार के गानों की महफिल सजती है, तो प्रवासी भारतीय न केवल उनके संगीत का आनंद लेते हैं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की उस प्रेरणा को भी महसूस करते हैं जो किशोर दा ने अपने जीवन से दी थी। खंडवा में आज भी उनका पैतृक आवास 'गांगुली हाउस' एक तीर्थ स्थल की तरह है, जो दुनिया को याद दिलाता है कि सफलता के आसमान पर पहुँचने के बाद भी जमीन से जुड़े रहना ही सच्ची महानता है।
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