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सिद्धारमैया मंत्रिमंडल विस्तार समारोह से रहे नदारद, डीके शिवकुमार ने कहा- 'पार्टी में सब ठीक है'
ICN24 Newsroom 4 अग॰ 2026, 11:37 am

कर्नाटक में 19 नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। हालांकि डीके शिवकुमार ने मतभेदों से इनकार किया है।
कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर खींचतान की खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं। सोमवार को राजभवन में आयोजित 19 नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अनुपस्थिति ने कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि सिद्धारमैया मंत्रियों की नई सूची और उसमें शामिल नामों को लेकर असंतुष्ट हैं। इस हाई-प्रोफाइल कार्यक्रम में उनकी गैर-मौजूदगी को पार्टी के भीतर गहराते मतभेद के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
समारोह के दौरान जब मुख्यमंत्री और अन्य वरिष्ठ नेता मंच पर मौजूद थे, तब सिद्धारमैया का खाली स्थान स्पष्ट रूप से नजर आ रहा था। सूत्रों का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर पिछले कुछ दिनों से खींचतान चल रही थी। विशेष रूप से कुछ खास निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व और वफादारों को जगह दिलाने को लेकर शीर्ष नेतृत्व के बीच असहमति की खबरें थीं। हालांकि, कांग्रेस के आधिकारिक हलकों ने इस पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन सिद्धारमैया का इस महत्वपूर्ण मोड़ पर गायब होना बहुत कुछ बयां कर रहा है।
इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। उन्होंने मीडिया से बातचीत में इन अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया कि पार्टी में कोई फूट है। शिवकुमार ने कहा, "पार्टी में सब कुछ ठीक है और हम सब एकजुट हैं। सिद्धारमैया जी की अनुपस्थिति को गलत तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए। वह किसी अन्य पूर्व निर्धारित व्यस्तता के कारण नहीं आ सके। हम सभी का लक्ष्य कर्नाटक का विकास और जनता से किए गए वादों को पूरा करना है।"
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर कर्नाटक मूल के प्रवासियों के लिए राज्य की यह राजनीतिक अस्थिरता चिंता का विषय रहती है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में रहने वाले कन्नड़ समुदाय के लोग अक्सर अपने गृह राज्य की प्रशासनिक स्थिरता को निवेश और विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं। नेतृत्व के बीच किसी भी प्रकार का टकराव सीधे तौर पर शासन और विकास परियोजनाओं की गति को प्रभावित कर सकता है, जिसका असर राज्य की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ता है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस आलाकमान इस स्थिति को कैसे संभालता है। कर्नाटक में पार्टी की मजबूती के लिए सिद्धारमैया और शिवकुमार का साथ चलना अनिवार्य माना जाता है। यदि यह असंतोष गहराता है, तो इससे न केवल सरकार के कामकाज पर असर पड़ेगा, बल्कि आगामी स्थानीय चुनावों में भी पार्टी की संभावनाओं को ठेस पहुंच सकती है। फिलहाल, सभी की नजरें सिद्धारमैया के अगले कदम पर टिकी हैं और इस बात पर कि क्या वह सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे।
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