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दिल्ली पुलिस पर हमला: 'चलो पार्लियामेंट' मार्च के दौरान हुई हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सुरक्षा दिशानिर्देशों की मांग
ICN24 Newsroom 30 जुल॰ 2026, 12:35 am

सुप्रीम कोर्ट 'चलो पार्लियामेंट' मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस पर हुए हिंसक हमलों के मामले की सुनवाई करेगा। घायल अधिकारियों के परिवारों ने सुरक्षा और जवाबदेही की मांग की है।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय 'चलो पार्लियामेंट' विरोध मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस के जवानों पर हुए हिंसक हमलों से संबंधित एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार है। यह मामला उस समय सामने आया है जब प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले सुरक्षाकर्मियों की सुरक्षा को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है। याचिका में न केवल हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई है, बल्कि भविष्य में पुलिस कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस दिशानिर्देश तैयार करने का भी आग्रह किया गया है।
यह याचिका घायल पुलिस अधिकारियों के परिवारों द्वारा दायर की गई है, जिन्होंने विरोध प्रदर्शनों के दौरान अपने प्रियजनों को आई गंभीर चोटों और उनके साथ हुई बर्बरता का विस्तार से वर्णन किया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जहां लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना एक मौलिक अधिकार है, वहीं सुरक्षाकर्मियों की सुरक्षा की कीमत पर हिंसा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने अदालत से हस्तक्षेप करने और एक ऐसी कार्यप्रणाली (SOP) विकसित करने का अनुरोध किया है जो भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिसकर्मियों को हिंसक हमलों से बचा सके।
इस मामले में सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों का एक बड़ा समूह भी सामने आया है। इन पूर्व अधिकारियों ने अपने घायल सहयोगियों के प्रति एकजुटता दिखाते हुए कहा है कि पुलिस बल का मनोबल बनाए रखने के लिए न्याय आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि ड्यूटी पर तैनात जवानों पर हमला करने वालों को सजा नहीं मिलती, तो यह पूरी व्यवस्था के लिए एक गलत मिसाल कायम करेगा। यह आंदोलन अब केवल कानूनी नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून प्रवर्तन और नागरिक अधिकारों के बीच के संतुलन पर एक सामाजिक विमर्श बन गया है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर विशेष महत्व रखती है। प्रवासी भारतीय अक्सर भारत में होने वाले बड़े विरोध प्रदर्शनों और उनके सामाजिक-राजनीतिक परिणामों को बारीकी से देखते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देशों में, जहां पुलिस प्रोटोकॉल और विरोध प्रदर्शनों के प्रबंधन के कड़े नियम हैं, वहां के भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिक इस बात की तुलना कर रहे हैं कि भारत अपनी लोकतांत्रिक चुनौतियों को कैसे संभालता है। सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच का यह संघर्ष वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय है।
सुप्रीम कोर्ट अब इस जटिल स्थिति का आकलन करेगा कि प्रदर्शनकारियों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हुए उन लोगों की रक्षा कैसे की जाए जो कानून की रक्षा के लिए सड़क पर खड़े हैं। इस सुनवाई के परिणाम न केवल दिल्ली पुलिस के लिए, बल्कि भारत के अन्य राज्यों के पुलिस बलों के लिए भी दूरगामी परिणाम ला सकते हैं। अदालत का फैसला यह तय करेगा कि सार्वजनिक शांति भंग होने की स्थिति में सुरक्षाकर्मियों की जवाबदेही और सुरक्षा के बीच की लकीर कहां खींची जाए।
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