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38 साल बाद खुला 'अदला-बदली' का राज: DNA टेस्ट ने बदली दो परिवारों की दुनिया, अस्पताल पर मुकदमा
ICN24 Newsroom 18 जुल॰ 2026, 01:33 pm

38 साल पहले अस्पताल में जन्म के समय दो बच्चों की अदला-बदली हो गई थी। DNA टेस्ट के माध्यम से इस सच्चाई के सामने आने के बाद अब दोनों पुरुषों ने अस्पताल पर केस कर दिया है।
करीब चार दशक पहले एक अस्पताल में हुई एक छोटी सी गलती ने दो बच्चों की नियति को हमेशा के लिए बदल दिया। 38 साल बाद, जब एक DNA टेस्ट के जरिए सच्चाई सामने आई, तो न केवल उन दोनों पुरुषों के होश उड़ गए, बल्कि उनके परिवारों की दुनिया भी पलट गई। अब, इन दोनों व्यक्तियों ने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया है।
यह घटना तब शुरू हुई जब दोनों का जन्म एक ही दिन, एक ही अस्पताल में हुआ था। अस्पताल के कर्मचारियों की कथित लापरवाही के कारण, बच्चों को उनके जैविक माता-पिता के बजाय एक-दूसरे के परिवारों को सौंप दिया गया। 38 वर्षों तक, दोनों पुरुष अपनी असली पहचान से अनजान, पूरी तरह से अलग परिवेश और पारिवारिक पृष्ठभूमि में पले-बढ़े। उन्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं था कि वे जिस परिवार को अपना समझ रहे हैं, उनके साथ उनका कोई जैविक संबंध नहीं है।
राज का खुलासा तब हुआ जब उनमें से एक ने कौतूहलवश एक 'होम DNA टेस्ट किट' का इस्तेमाल किया। टेस्ट के नतीजों ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि उसका DNA उसके माता-पिता से मेल नहीं खाता। इसके बाद जब गहराई से छानबीन की गई और अस्पताल के रिकॉर्ड खंगाले गए, तो यह स्पष्ट हो गया कि जन्म के समय ही उनकी अदला-बदली हो गई थी। इस खुलासे ने दोनों परिवारों को भावनात्मक रूप से झकझोर कर रख दिया है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर एक बड़ी चेतावनी और चर्चा का विषय है। प्रवासी परिवारों के लिए, उनकी वंशावली और जैविक जड़ें उनकी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। इस तरह की घटनाएं न केवल स्वास्थ्य प्रणाली पर भरोसे को कम करती हैं, बल्कि उन परिवारों के लिए भी बड़ी त्रासदी होती हैं जो अपनी विरासत को संजो कर रखते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि आज के दौर में आधुनिक ट्रैकिंग और बारकोडिंग सिस्टम के कारण ऐसी गलतियां दुर्लभ हैं, लेकिन 1980 के दशक में प्रोटोकॉल इतने सख्त नहीं थे।
अब दोनों पुरुषों ने संबंधित स्वास्थ्य प्राधिकरण और अस्पताल पर मुकदमा दायर कर मुआवजे की मांग की है। उनका तर्क है कि अस्पताल की लापरवाही ने उनसे उनकी असली पहचान, उनके वास्तविक माता-पिता के साथ समय बिताने का अधिकार और उनकी विरासत छीन ली। यह मामला अब न केवल कानूनी लड़ाई बन गया है, बल्कि चिकित्सा नैतिकता और रिकॉर्ड प्रबंधन की खामियों पर भी सवाल उठा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भविष्य में अस्पतालों के लिए एक बड़ा उदाहरण पेश कर सकता है।
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