राजनीति
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौता: दशकों लंबी साझेदारी की नींव
ICN24 Newsroom 23 जुल॰ 2026, 09:35 am
अमेरिका और सऊदी अरब ने एक नागरिक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर के ऊर्जा सहयोग का मार्ग प्रशस्त करेगा।
वाशिंगटन और रियाद ने एक ऐतिहासिक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते की घोषणा की है, जो मध्य पूर्व की भू-राजनीति और वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत है। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट के अनुसार, यह समझौता एक ऐसी कानूनी नींव रखता है जो आने वाले दशकों तक चलने वाली बहु-अरबी डॉलर की साझेदारी को मजबूती प्रदान करेगा। यह कदम सऊदी अरब के अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो को तेल से इतर विविधता देने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
इस समझौते को अमेरिकी कानून के 'सेक्शन 123' के तहत तैयार किया गया है, जो अन्य देशों के साथ परमाणु तकनीक साझा करने के लिए कड़े मानकों की मांग करता है। इस सौदे का मुख्य उद्देश्य सऊदी अरब को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा विकसित करने में मदद करना है। हालांकि, इसमें परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए सख्त सुरक्षा उपाय भी शामिल किए गए हैं। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यह समझौता न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि क्षेत्र में चीन और रूस के बढ़ते परमाणु प्रभाव को भी कम करेगा।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए इस विकास के गहरे मायने हैं। भारत और सऊदी अरब के बीच मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, और मध्य पूर्व में किसी भी प्रकार की स्थिरता या तकनीकी प्रगति का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में से एक है। वैश्विक स्तर पर नागरिक परमाणु क्षेत्र में हो रहे ये विस्तार भविष्य में ऑस्ट्रेलिया के लिए नए निर्यात बाजार खोल सकते हैं।
सऊदी अरब की 'विजन 2030' योजना के तहत देश अपनी अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी तकनीक और विशेषज्ञता का लाभ उठाकर रियाद अपनी बिजली ग्रिड को कार्बन मुक्त बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। ऊर्जा सचिव राइट ने जोर देकर कहा कि यह साझेदारी केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दो देशों के बीच विश्वास और दीर्घकालिक सहयोग का प्रतीक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझौता हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है। चूंकि भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही 'क्वाड' के सदस्य हैं और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए अमेरिका-सऊदी परमाणु सहयोग मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया के बीच व्यापारिक गलियारों को और अधिक सुरक्षित बना सकता है। हालांकि, इस समझौते को अभी अमेरिकी कांग्रेस से अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना होगा, जहां गैर-प्रसार मानकों को लेकर गहन चर्चा होने की संभावना है।
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