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प्रभात ध्यानी की हिरासत पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, पुलिस से पूछा- किस आधार पर रोका गया रास्ता?

ICN24 Newsroom 21 जुल॰ 2026, 02:36 am
प्रभात ध्यानी की हिरासत पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, पुलिस से पूछा- किस आधार पर रोका गया रास्ता?

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उवापा अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को हिरासत में लिए जाने पर पुलिस से कड़े सवाल किए हैं, जब वे दिल्ली में आयोजित संसद मार्च में शामिल होने जा रहे थे।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य पुलिस से उन परिस्थितियों पर विस्तृत और कड़ा स्पष्टीकरण मांगा है, जिनके तहत उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (UPP) के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को हिरासत में लिया गया था। न्यायालय ने यह सवाल उस समय उठाया जब ध्यानी दिल्ली में आयोजित एक विरोध मार्च में शामिल होने जा रहे थे। इस कानूनी हस्तक्षेप ने एक बार फिर नागरिक अधिकारों और पुलिस की निवारक शक्तियों (Preventive Powers) के बीच के संतुलन पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्रवाई के कानूनी आधार पर सवाल खड़े किए। ध्यानी 'सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) द्वारा आयोजित 'संसद मार्च' में हिस्सा लेने के लिए रवाना हुए थे, लेकिन उन्हें रास्ते में ही रोककर हिरासत में ले लिया गया। उनके समर्थकों और कानूनी टीम का आरोप है कि उन्हें बिना किसी ठोस कारण के केवल उनकी राजनीतिक विचारधारा और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की मंशा के कारण निशाना बनाया गया। अदालत में याचिकाकर्ता के वकील ने पुरजोर तरीके से दलील दी कि किसी व्यक्ति को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने के लिए देश की राजधानी जाने से रोकना मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है। भारत के संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति और आवाजाही की स्वतंत्रता प्राप्त है। दूसरी ओर, सरकारी वकील ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने का हवाला देते हुए इस कार्रवाई को एहतियाती कदम के तौर पर पेश किया। हालांकि, अदालत ने इस तर्क पर प्रारंभिक असंतोष जताते हुए पुलिस से विस्तृत हलफनामा तलब किया है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भारत में नागरिक स्वतंत्रता और न्यायिक सक्रियता से जुड़े ऐसे मामले विशेष महत्व रखते हैं। प्रवासी भारतीय, जो अक्सर ऑस्ट्रेलिया के मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा होते हैं, भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होने वाली इन कानूनी कार्यवाहियों को बारीकी से देखते हैं। यह मामला सीधे तौर पर भारत की लोकतांत्रिक छवि और वहां कानून के शासन की स्थिति को दर्शाता है। उच्च न्यायालय ने पुलिस से विशेष रूप से पूछा है कि क्या ध्यानी के पास कोई आपत्तिजनक सामग्री थी या क्या उनकी मौजूदगी से मौके पर हिंसा की कोई वास्तविक और तात्कालिक आशंका थी? न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई ठोस प्रमाण नहीं है, तो किसी राजनेता के यात्रा करने के अधिकार को बाधित करना संवैधानिक गरिमा के खिलाफ है। पुलिस को अब यह साबित करना होगा कि यह कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध नहीं बल्कि कानून की अनिवार्य आवश्यकता थी। यह मामला न केवल प्रभात ध्यानी के लिए बल्कि भारत के उन तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक मिसाल बन सकता है जो अक्सर प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक निरोध) के प्रावधानों के दुरुपयोग की शिकायत करते हैं। उत्तराखंड हाईकोर्ट का कड़ा रुख यह संदेश देता है कि पुलिस की शक्तियों का उपयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता और लोकतांत्रिक विरोध को दबाने के लिए कानून का ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई पर पूरे देश की नजरें टिकी होंगी।
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