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शिलांग में रेहड़ी-पटरी वालों का प्रदर्शन: पुनर्वास स्थल को बताया 'आर्थिक जंगल', 17 अगस्त की समय सीमा का विरोध
ICN24 Newsroom 5 अग॰ 2026, 12:38 pm
शिलांग के लैतुमखराह में रेहड़ी-पटरी वालों ने सरकार के पुनर्वास प्रस्ताव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने नए स्थल को 'आर्थिक जंगल' बताते हुए अपनी आजीविका बचाने की मांग की है।
मेघालय की राजधानी शिलांग में रेहड़ी-पटरी वालों और प्रशासन के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। लैतुमखराह (Laitumkhrah) क्षेत्र के स्ट्रीट वेंडर्स ने सरकार द्वारा प्रस्तावित पुनर्वास स्थलों के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। प्रदर्शनकारियों ने इन नए स्थलों को 'आर्थिक जंगल' करार दिया है, जहां व्यापार की कोई संभावना नहीं है। सरकार ने इन विक्रेताओं को हटाने के लिए 17 अगस्त की समय सीमा तय की है, जिसका वेंडर यूनियन पुरजोर विरोध कर रही है।
मंगलवार को हुए इस विरोध प्रदर्शन के दौरान विक्रेताओं ने तर्क दिया कि सरकार केवल शहरी सौंदर्यीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जबकि सैकड़ों परिवारों की आजीविका दांव पर लगी है। जेल रोड (Jail Road) के विक्रेताओं ने सरकार से आग्रह किया है कि उन्हें शाम के समय व्यापार करने की अनुमति दी जाए। उनका कहना है कि प्रस्तावित साइटें मुख्य बाजार से इतनी दूर हैं कि वहां ग्राहकों का आना लगभग असंभव है। विक्रेताओं के अनुसार, व्यापारिक केंद्र से दूर जाना उनके लिए आर्थिक आत्महत्या के समान होगा।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के नजरिए से देखें तो शहरी नियोजन और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का यह संघर्ष नया नहीं है। सिडनी या मेलबर्न जैसे शहरों में जहां 'मार्केट डेज' और 'स्ट्रीट वेंडिंग' के लिए स्पष्ट नियम और जोन बने हुए हैं, भारत में यह क्षेत्र अब भी कानूनी और प्रशासनिक अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले कई प्रवासी भारतीय, जो अक्सर अपने गृह नगरों की यादों में इन जीवंत बाजारों को संजोकर रखते हैं, वे इस बात को समझते हैं कि ये वेंडर्स न केवल अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं, बल्कि शहर की संस्कृति की रीढ़ भी हैं।
प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास मानवीय संवेदनाओं और आजीविका के अधिकार की कीमत पर नहीं होना चाहिए। वेंडर्स का कहना है कि प्रशासन ने बिना किसी जमीनी सर्वेक्षण के उन्हें स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है। उन्होंने मांग की है कि 17 अगस्त की समय सीमा को तत्काल वापस लिया जाए और एक ऐसा समाधान निकाला जाए जिसमें उनका व्यापार भी सुरक्षित रहे और शहर का यातायात भी प्रभावित न हो।
आने वाले दिनों में यदि सरकार और वेंडर्स के बीच कोई सहमति नहीं बनती है, तो यह आंदोलन और उग्र हो सकता है। फिलहाल, मेघालय सरकार के अगले कदम पर सभी की निगाहें टिकी हैं। क्या प्रशासन शहरी सौंदर्य और गरीब विक्रेताओं की थाली के बीच संतुलन बना पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।
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